झुके बीम, टेढ़ा किचन स्ट्रक्चर, अधूरे दस्तावेज, सुरक्षा विहीन मजदूर और रेत के रिकॉर्ड पर सवाल; करोड़ों की परियोजना में गुणवत्ता को लेकर उठे गंभीर प्रश्न

सूरजपुर/प्रतापपुर:  सरनापारा में निर्माणाधीन एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय (EMRS) परिसर बुधवार को अचानक चर्चा का केंद्र बन गया, जब सरगुजा संभाग आयुक्त कार्यालय द्वारा गठित उच्चस्तरीय जांच समिति मौके पर पहुंची। करोड़ों रुपये की लागत से बन रहे इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट में घटिया निर्माण, तकनीकी अनियमितता, अवैध रेत उपयोग और गुणवत्ता से समझौते की शिकायतों की जांच के लिए पहुंची टीम ने एक-एक बिंदु का सूक्ष्म निरीक्षण किया। पूरे दिन परिसर में गहमागहमी का माहौल बना रहा और क्षेत्र भर की निगाहें जांच पर टिकी रहीं।

शिकायतकर्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता चंद्रिका कुशवाहा तथा मनीष गुप्ता द्वारा सरगुजा संभाग आयुक्त को भेजी गई शिकायत के आधार पर यह जांच कराई गई। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि निर्माण कार्य स्वीकृत तकनीकी मानकों के अनुरूप नहीं किया जा रहा है तथा कई स्थानों पर गुणवत्ता से गंभीर समझौता किया गया है।

आयुक्त ने गठित की थी तीन सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति

13 जून 2026 को जारी आदेश के अनुसार जांच समिति मेंउपायुक्त (विकास), सरगुजा संभाग, अंबिकापुर  अध्यक्ष,  अधीक्षण अभियंता, ग्रामीण यांत्रिकी विभाग, सरगुजा — सदस्य, जिला खनिज अधिकारी, अंबिकापुर सदस्य/सचिव को शामिल किया गया।जांच के दौरान एसडीएम ललिता भगत, मंडल संयोजक रंजय सिंह, शिकायतकर्ता चंद्रिका कुशवाहा, मनीष गुप्ता सहित कई अधिकारी और कर्मचारी मौजूद रहे।

शिकायत से भी अधिक गंभीर तस्वीर सामने आने की चर्चा

स्थानीय सूत्रों के अनुसार जांच केवल शिकायत में दर्ज बिंदुओं तक सीमित नहीं रही। निरीक्षण के दौरान ऐसे कई निर्माण संबंधी पहलू सामने आए, जिन पर टीम ने विशेष रूप से ध्यान दिया।बताया जाता है कि बालक छात्रावास भवन के कुछ हिस्सों में बीम नीचे की ओर झुके हुए दिखाई दिए। वहीं किचन भवन के कुछ हिस्सों में संरचनात्मक असंतुलन को लेकर भी सवाल उठे। निरीक्षण के दौरान टीम ने इन बिंदुओं का बारीकी से परीक्षण किया।

निर्माण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी भवन के बीम, स्लैब और भार वहन करने वाले हिस्सों में तकनीकी मानकों का पालन नहीं किया जाए तो भविष्य में दरारें आने, मजबूती प्रभावित होने और सुरक्षा जोखिम बढ़ने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।

जाली और सरिया पर सबसे बड़ा सवाल

शिकायत में कहा गया था कि किचन शेड की स्लैब ढलाई में जहां तकनीकी मानकों के अनुसार लगभग 5 से 6 इंच की दूरी पर जाली बिछाई जानी थी, वहीं कई स्थानों पर यह दूरी 9 से 10 इंच तक पाई गई। इसके अलावा बीम में निर्धारित संख्या से कम सरिया उपयोग किए जाने का भी आरोप सही मिला।

जांच टीम ने इन बिंदुओं का भौतिक सत्यापन किया तथा संबंधित तकनीकी अभिलेखों की भी जांच की।

"कहीं जल्दबाजी तो नहीं?" निर्माण गुणवत्ता पर उठे सवाल

निरीक्षण के दौरान ईंट की जोड़ाई, ढलाई की गुणवत्ता और क्योरिंग (तराई) को लेकर भी सवाल उठे। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि ढलाई के बाद पर्याप्त पानी नहीं दिया गया, जिससे निर्माण की मजबूती प्रभावित हो सकती है।

सूत्रों के अनुसार कई स्थानों पर निर्माण कार्य ऐसा प्रतीत हुआ मानो तकनीकी निगरानी के बजाय केवल मजदूरों और मिस्त्रियों के भरोसे काम कराया गया हो। हालांकि इन सभी बिंदुओं पर अंतिम निष्कर्ष जांच प्रतिवेदन के बाद ही स्पष्ट होंगे।

दस्तावेजों की जांच में भी उठे प्रश्न

जांच टीम ने निर्माण से जुड़े विभिन्न तकनीकी दस्तावेज, गुणवत्ता नियंत्रण रजिस्टर, सामग्री उपयोग का रिकॉर्ड और खनिज संबंधी दस्तावेज मांगे। बताया जाता है कि कुछ आवश्यक अभिलेख तत्काल उपलब्ध नहीं कराए जा सके, जिसके बाद टीम ने संबंधित तथ्यों को अपने प्रतिवेदन में शामिल करने की बात कही।

मजदूरों की सुरक्षा भगवान भरोसे?

निरीक्षण के दौरान मजदूरों की सुरक्षा व्यवस्था भी सवालों के घेरे में रही। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि कई मजदूर बिना हेलमेट, सेफ्टी बेल्ट, ग्लव्स और सुरक्षा जूतों के कार्य करते दिखाई दिए।

यदि यह तथ्य जांच में प्रमाणित होता है तो यह श्रम सुरक्षा नियमों के उल्लंघन का गंभीर मामला माना जा सकता है।

4702 ट्रैक्टर रेत उपयोग का दावा, लेकिन पिटपास कहां?

पूरे मामले का सबसे गंभीर पहलू रेत उपयोग और खनिज दस्तावेजों को लेकर सामने आया। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि निर्माण में हजारों ट्रैक्टर-ट्रॉली रेत उपयोग की गई, जबकि वैध पिटपास और रॉयल्टी संबंधी दस्तावेजों को लेकर गंभीर सवाल मौजूद हैं।

शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि समीपस्थ नदी क्षेत्र से बड़े पैमाने पर रेत निकालकर निर्माण कार्य में उपयोग किया गया। यही कारण है कि जांच समिति में जिला खनिज अधिकारी को भी शामिल किया गया।

सैकड़ों आदिवासी बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा सवाल

यह विद्यालय भविष्य में आदिवासी क्षेत्र के सैकड़ों छात्र-छात्राओं का आवासीय शिक्षण केंद्र बनने वाला है। ऐसे में यदि निर्माण गुणवत्ता पर उठे सवाल सही साबित होते हैं तो मामला केवल वित्तीय अनियमितता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि विद्यार्थियों की सुरक्षा से भी सीधे जुड़ जाएगा।

अब नजरें जांच रिपोर्ट पर

जांच समिति ने मौके पर निरीक्षण के बाद विस्तृत प्रतिवेदन तैयार कर संभागायुक्त कार्यालय को सौंपने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। अब पूरे प्रतापपुर क्षेत्र सहित सरगुजा संभाग की नजर इस रिपोर्ट पर टिकी है।सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि जांच में गंभीर तकनीकी खामियां और अनियमितताएं प्रमाणित होती हैं तो क्या निर्माण कार्य रोका जाएगा? क्या स्वतंत्र कोर कटिंग टेस्ट और स्ट्रक्चरल स्टेबिलिटी जांच कराई जाएगी? और क्या जिम्मेदारों के खिलाफ कठोर कार्रवाई होगी?इन सवालों के जवाब अब संभागीय जांच रिपोर्ट और प्रशासनिक निर्णयों में छिपे हैं।

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