

अपूर्ण जवाब, गलत मोबाइल नंबर, अपीलीय प्राधिकारी का उल्लेख नहीं, व्हाट्सएप से भेजे गए पत्र और नियमों की अनदेखी; कई प्रकरण राज्य सूचना आयोग तक पहुंचे
जनहित के प्रस्ताव पर विभाग की प्रतिक्रिया भी चर्चा का विषय, क्या ऐसे प्रस्तावों को केवल "योजना उपलब्ध नहीं है" कहकर निस्तारित करना पर्याप्त है?
बलरामपुर (अभिषेक कुमार सोनी)। बलरामपुर जिले में सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। ग्राम पंचायतों, आईटीडीपी तथा आदिम जाति एवं अनुसूचित जाति विकास विभाग से जुड़े कई आरटीआई प्रकरणों में विरोधाभासी उत्तर, अपूर्ण जानकारी, प्रक्रियागत त्रुटियां तथा अधिनियम के प्रावधानों की कथित अनदेखी सामने आने का दावा किया गया है। इन मामलों में कई प्रथम अपीलें दायर हो चुकी हैं, जबकि कुछ प्रकरणों में द्वितीय अपील राज्य सूचना आयोग के समक्ष प्रस्तुत की गई है।
जनपद पंचायत राजपुर ग्राम पंचायत कार्यालयों में आरटीआई प्रावधानों के पालन पर सवाल
आवेदकों का आरोप है कि जनपद पंचायत राजपुर अंतर्गत कुछ ग्राम पंचायतों में निर्धारित 30 दिन की समय-सीमा के भीतर सूचना उपलब्ध नहीं कराई गई। दो मामलों में केवल फोटोकॉपी शुल्क जमा करने की सूचना दी गई, लेकिन यह नहीं बताया गया कि कुल कितने पृष्ठों की प्रतियां उपलब्ध कराई जाएंगी तथा प्रति पृष्ठ शुल्क किस आधार पर निर्धारित किया गया है। साथ ही सूचना का अधिकार अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप अभिलेखों के निरीक्षण का विकल्प भी उपलब्ध नहीं कराया गया।
एक अन्य मामले में आवेदक को केवल विभागीय वेबसाइट देखने की सलाह देकर प्रकरण का निराकरण करने का प्रयास किया गया। जबकि आवेदक का कहना है कि जब प्रमाणित प्रतियां मांगी गई हैं, तब केवल पोर्टल या वेबसाइट का हवाला देकर लोक सूचना अधिकारी अपनी वैधानिक जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता। पंचायत के मूल अभिलेख जैसे बिल, वाउचर, मस्टर रोल, मापन पुस्तिका, स्वीकृति आदेश तथा अन्य अभिलेखों की प्रमाणित प्रतियां उपलब्ध कराना आवश्यक है।
हालांकि इन मामलों में प्रथम अपीलीय अधिकारी द्वारा जनसूचना अधिकारियों को शीघ्र प्रमाणित प्रतिलिपियां उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं। इसके बावजूद यह प्रश्न बना हुआ है कि ऐसी प्रक्रियागत लापरवाही के लिए जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होगी।
चार आरटीआई आवेदन, फिर भी नहीं मिला कोई उत्तर
एक अन्य प्रकरण में 20 मई 2026 को ग्राम पंचायत बगाड़ी एवं बूढ़ाबगीचा में निर्माण कार्यों और मनरेगा से संबंधित चार अलग-अलग आरटीआई आवेदन प्रस्तुत किए गए थे। आवेदक का कहना है कि निर्धारित समय-सीमा समाप्त होने के बाद भी न तो सूचना उपलब्ध कराई गई और न ही कोई उत्तर दिया गया। अब इन मामलों में प्रथम अपील दायर करने की तैयारी है।
ऐसे में यह प्रश्न भी उठ रहा है कि यदि अधिकांश प्रकरणों का निराकरण प्रथम अपील या राज्य सूचना आयोग के स्तर पर ही होगा, तो जन सूचना अधिकारियों की जवाबदेही और भूमिका क्या रह जाएगी।
आईटीडीपी एवं आदिम जाति विकास विभाग के उत्तरों में विरोधाभास
आदिम जाति एवं अनुसूचित जाति विकास विभाग तथा आईटीडीपी से जुड़े कई आरटीआई मामलों में भी विभागीय उत्तरों में विरोधाभास सामने आने का दावा किया गया है। अलग-अलग आवेदनों पर भिन्न-भिन्न उत्तर दिए जाने तथा एक आवेदन को विषय स्पष्ट न होने के आधार पर निरस्त किए जाने से विभागीय कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न खड़े हो रहे हैं।
आवेदक का आरोप है कि यदि संबंधित कार्यालय के पास सूचना उपलब्ध नहीं थी, तो सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 6(3) के अनुसार आवेदन सक्षम लोक प्राधिकारी को हस्तांतरित किया जाना चाहिए था, जिसका पालन नहीं किया गया।
गलत मोबाइल नंबर, व्हाट्सएप से पत्र और अपीलीय प्राधिकारी का उल्लेख नहीं
मामले को और गंभीर तब माना जा रहा है जब सहायक आयुक्त जैसे उच्च अधिकारी द्वारा जारी कुछ पत्रों में आवेदक का मोबाइल नंबर गलत दर्ज पाया गया। आवेदक का आरोप है कि कुछ पत्र प्रारंभ में केवल व्हाट्सएप के माध्यम से भेजे गए और प्रथम अपील दायर होने के बाद उन्हीं प्रकरणों में स्पीड पोस्ट से प्रेषित किए गए।
आवेदक का यह भी आरोप है कि कई आदेशों एवं उत्तरों में सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 19(1) के अनुरूप प्रथम अपीलीय प्राधिकारी का नाम, पदनाम एवं पता अंकित नहीं किया गया, जिससे अपील के वैधानिक अधिकार के उपयोग में कठिनाई उत्पन्न हुई।
जनहित के प्रस्ताव पर भी विभाग का जवाब सवालों के घेरे में
सूचना के अधिकार से जुड़े प्रकरणों के बीच आदिवासी विकास विभाग का एक अन्य पत्राचार भी चर्चा का विषय बना हुआ है। भारत सरकार से मान्यता प्राप्त एक संस्था के द्वारा आदिवासी क्षेत्रों में जागरूकता कार्यक्रम, खेल प्रतिभा प्रोत्साहन एवं प्रतियोगी परीक्षा कोचिंग सुविधा प्रारंभ कराने का प्रस्ताव विभाग को भेजा गया था। विभाग ने अपने उत्तर में उल्लेख किया कि वर्तमान में इस संबंध में कोई योजना संचालित नहीं है।इसके बाद आवेदक ने पुनः पत्र भेजकर अनुरोध किया कि यदि विभाग स्तर पर ऐसी कोई योजना उपलब्ध नहीं है, तो प्रस्ताव को शासन अथवा सक्षम उच्च कार्यालय को विचारार्थ भेजा जाए, ताकि जनहित में निर्णय लिया जा सके।
अब यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या ऐसे जनहित प्रस्तावों को केवल "योजना उपलब्ध नहीं है" कहकर निस्तारित किया जाना पर्याप्त है, अथवा उन्हें सक्षम स्तर पर विचारार्थ भेजा जाना चाहिए, जिससे भविष्य में आवश्यक होने पर नई योजनाओं या पहल पर निर्णय लिया जा सके। यदि हर जनहित प्रस्ताव का यही जवाब होगा कि "योजना नहीं है", तो फिर नई योजनाओं और नवाचारों की पहल आखिर होगी कहां से?
राज्य सूचना आयोग तक पहुंचे कई मामले
इन प्रकरणों में कई प्रथम अपीलें दायर की जा चुकी हैं तथा अनेक मामलों में द्वितीय अपील राज्य सूचना आयोग के समक्ष प्रस्तुत की गई है। अपीलों में विभागीय अभिलेखों, नोटशीट, निर्गमन रजिस्टर, पत्राचार प्रक्रिया तथा रिकॉर्ड संधारण की स्वतंत्र जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय किए जाने की मांग की गई है।
केवल आरटीआई नहीं, प्रशासनिक जवाबदेही का भी प्रश्न
यदि इन आरोपों की निष्पक्ष जांच होती है, तो यह मामला केवल सूचना का अधिकार अधिनियम तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जिले में प्रशासनिक पारदर्शिता, रिकॉर्ड प्रबंधन तथा विभागीय जवाबदेही की वास्तविक स्थिति भी सामने आ सकती है। आवेदकों का कहना है कि सूचना प्राप्त करना प्रत्येक नागरिक का वैधानिक अधिकार है। समय-सीमा में सूचना उपलब्ध न कराना अथवा विरोधाभासी उत्तर देना न केवल अधिनियम की भावना के विपरीत है, बल्कि इससे आवेदकों को अनावश्यक समय और आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ रहा है।
अब निगाहें कलेक्टर पर,क्या तय होगी जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही?
बलरामपुर में हाल ही में पदस्थ हुई कलेक्टर चंदन संजय त्रिपाठी प्रशासनिक अनुशासन और प्रक्रियागत सख्ती के लिए जानी जाती हैं। उनके कार्यभार ग्रहण करने के बाद जिले में कई प्रशासनिक सुधार देखने को मिले हैं। ऐसे में अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सूचना के अधिकार अधिनियम से जुड़े इन मामलों में जिला प्रशासन क्या रुख अपनाता है और क्या संबंधित विभागों की जवाबदेही तय की जाएगी।
नोट: समाचार में उल्लिखित तथ्यों के समर्थन में संबंधित आरटीआई आवेदन, विभागीय उत्तर, जनहित प्रस्ताव, प्रथम अपील, द्वितीय अपील तथा अन्य संबंधित दस्तावेजों की प्रतियां आवेदक एवं संचार टुडे सीजीएमपी न्यूज़ के पास सुरक्षित हैं। आवश्यकता पड़ने पर इन्हें सक्षम प्राधिकारी अथवा सक्षम न्यायिक मंच के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है।





















