नई दिल्ली: दहेज प्रताड़ना और महिला की संदिग्ध मौत से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि शादी के बाद लड़कियों और उनके परिवार का अपमान करना समाज में गंभीर समस्या बन चुकी है। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में कड़ा संदेश देना बेहद जरूरी है।

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ छत्तीसगढ़ के एक मामले की सुनवाई कर रही थी। मामला वर्ष 2010 का है, जिसमें शादी के तीन साल के भीतर एक महिला की ससुराल में फांसी लगने से मौत हो गई थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, महिला को दहेज के लिए लगातार मानसिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित किया जाता था।

मृतका के परिजनों ने आरोप लगाया कि ससुराल पक्ष की ओर से नकद रकम और कार की मांग की जा रही थी। शादी के बाद लगातार आर्थिक दबाव बनाया गया और मौत से पहले भी दहेज की मांग जारी थी। मेडिकल रिपोर्ट में महिला की मौत दम घुटने से होना बताया गया, लेकिन अदालत ने माना कि दहेज प्रताड़ना और उत्पीड़न का उसकी मौत से सीधा संबंध था।

इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने पति के परिवार के कई सदस्यों को दहेज मृत्यु, आत्महत्या के लिए उकसाने और क्रूरता से जुड़े अपराधों में दोषी ठहराया था। बाद में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने भी निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा।

सुप्रीम कोर्ट में महिला के देवर ने भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के तहत मिली सजा को चुनौती देते हुए याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उस पर केवल प्रताड़ना का आरोप है और मामला नहीं बनता। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया।

सुनवाई के दौरान जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा, “आपको खुश होना चाहिए कि सिर्फ धारा 498ए लगी है और केवल तीन साल की सजा हुई है।” अदालत ने यह भी कहा कि कई मामलों में बहू और उसके परिवार से लगातार पैसे निकालने की कोशिश की जाती है।

अदालत ने रिकॉर्ड का हवाला देते हुए बताया कि मृतका के परिवार को ‘भिखारी’ तक कहा गया था। इस पर नाराजगी जताते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि लड़की का पिता अपनी बेटी को बचाने के लिए पैसे देने को तैयार था, इसके बावजूद उसका अपमान किया गया।

याचिकाकर्ता की ओर से एफआईआर दर्ज कराने में देरी का मुद्दा भी उठाया गया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे महत्व नहीं दिया। अदालत ने कहा कि दहेज प्रताड़ना के मामलों में समाज को स्पष्ट और सख्त संदेश देने की आवश्यकता है।

जस्टिस उज्जल भुइयां ने भी टिप्पणी करते हुए कहा कि हैरानी की बात यह है कि ऐसे मामलों में पढ़े-लिखे लोग भी शामिल होते हैं। अंत में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए याचिका खारिज कर दी।

इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ऋषि जायसवाल ने पैरवी की।

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