रायपुर: छत्तीसगढ़ में वेटलैंड संरक्षण और पर्यावरण संतुलन को मजबूत बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। कल 19 मई को छत्तीसगढ़ स्टेट वेटलैंड ऑथोरिटी और महात्मा गांधी उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, दुर्ग के बीच समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए। इस समझौते पर विश्वविद्यालय के कुलपति श्री रवि रत्न सक्सेना और छत्तीसगढ़ स्टेट वेटलैंड ऑथोरिटी के सदस्य सचिव  मातेश्वरन व्ही. ने हस्ताक्षर किए।यह समझौता राज्य में वेटलैंड संरक्षण, जैव विविधता संवर्धन, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया गया है। इसके तहत दोनों संस्थाएं मिलकर अनुसंधान, तकनीकी प्रशिक्षण, जागरूकता कार्यक्रम, फील्ड अध्ययन और वेटलैंड आधारित विकास गतिविधियों पर काम करेंगी। इस पहल से राज्य के विभिन्न वेटलैंड क्षेत्रों में वैज्ञानिक अध्ययन, जल संरक्षण और जैव विविधता संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही स्थानीय समुदायों की भागीदारी से पर्यावरण संरक्षण से जुड़े विकास कार्यों को भी गति मिलेगी।
समझौते के माध्यम से विद्यार्थियों और शोधार्थियों को वेटलैंड प्रबंधन, संरक्षण तकनीकों और पर्यावरणीय अनुसंधान के क्षेत्र में व्यावहारिक अनुभव प्राप्त होगा। इससे युवाओं को पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में नई जानकारी और प्रशिक्षण मिल सकेगा। छत्तीसगढ़ स्टेट वेटलैंड ऑथोरिटी के सदस्य सचिव  मातेश्वरन व्ही. ने कहा कि विश्वविद्यालय के साथ यह साझेदारी वेटलैंड संरक्षण के क्षेत्र में लंबे समय तक सकारात्मक परिणाम देगी। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक संस्थानों और शोधार्थियों के सहयोग से वेटलैंड क्षेत्रों के संरक्षण और बेहतर प्रबंधन में महत्वपूर्ण मदद मिलेगी।

भारत में वेटलैंड (आर्द्रभूमि) संरक्षण को एक मजबूत आधार मिल रहा है। केंद्र और राज्य सरकारों की नई पहलों, जैसे वेटलैंड मित्र योजना और रामसर साइटों के विस्तार, ने पारिस्थितिकी तंत्र, जलीय जीवों और प्रवासी पक्षियों के संरक्षण को नई गति दी है। छत्तीसगढ़ में कोपरा जलाशय, गिधवा-परसदा, कुरंदी, गंगरेल, नीमगांव और मांढर जैसे प्रमुख जलाशयों को रामसर साइट में शामिल करने की प्रक्रिया प्राथमिकता पर चल रही है  छत्तीसगढ़ जैसे राज्य वेटलैंड्स  क्षेत्रों को कानूनी सुरक्षा और विशेष संरक्षण कोष प्राप्त हो रहा है।

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