अम्बिकेश गुप्ता:

कुसमी। बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के कुसमी तहसील अंतर्गत ग्राम अमरपुर में करीब तीन दशक पुरानी जमीन को लेकर सामने आया विवाद अब नए सवाल खड़े कर रहा है। भू-स्वामी बंधन राम की ओर से आरोप लगाया गया है कि उनकी जमीन को लेकर 19 मार्च 1996 को उस समय महज करीब 3 वर्ष के नाबालिग शिवकुमार भगत, पिता जदुवर राम, निवासी ग्राम जिरहुल के नाम कथित रूप से रजिस्ट्री कराई गई, जबकि इसके करीब दो माह पहले ही 18 जनवरी 1996 को उसी भूमि का नामांतरण दर्ज कर दिया गया था।

बंधन राम का कहना है कि रजिस्ट्री से पहले नामांतरण दर्ज होने का यह तथ्य हाल ही में नामांतरण पंजी की प्रति निकलवाने के बाद सामने आया है। उनका आरोप है कि इसी प्रक्रिया में जमीन के दस्तावेजों के साथ हेरफेर की गई और अब इस पूरे मामले की जांच की आवश्यकता है।

हालांकि, यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व), कुसमी के समक्ष चली राजस्व अपील में मुख्य रूप से वर्ष 1996 के नामांतरण को करीब 29 वर्ष बाद चुनौती देने और विलंब माफी का प्रश्न सामने आया था। रजिस्ट्री से पहले नामांतरण दर्ज होने के कथित तथ्य को उस राजस्व अपील में इसी रूप में मुख्य तर्क के तौर पर प्रस्तुत नहीं किया गया था। इसलिए इस नए तथ्य की स्वतंत्र दस्तावेजी जांच होना जरूरी है।

रजिस्ट्री 19 मार्च को, नामांतरण 18 जनवरी को होने का दावा..

मामले में उपलब्ध राजस्व दस्तावेजों के अनुसार विवादित भूमि के संबंध में नामांतरण क्रमांक 03 दिनांक 18 जनवरी 1996 का उल्लेख सामने आता है। वहीं अनावेदक पक्ष ने राजस्व न्यायालय में अपने जवाब में भूमि की खरीद के आधार के रूप में पंजीकृत विक्रय पत्र दिनांक 19 मार्च 1996 का उल्लेख किया था। यही तारीखों का अंतर अब विवाद का सबसे अहम बिंदु बन गया है। यदि संबंधित नामांतरण वास्तव में 18 जनवरी 1996 को दर्ज हुआ था और विक्रय पत्र 19 मार्च 1996 को पंजीकृत हुआ, तो रजिस्ट्री से पहले नामांतरण दर्ज होने की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। हालांकि, इस क्रम की वास्तविक प्रकृति क्या थी, नामांतरण किस दस्तावेज या आदेश के आधार पर दर्ज हुआ और राजस्व अभिलेख में दर्ज तारीखों का पूरा संदर्भ क्या है, यह संबंधित मूल अभिलेखों की जांच के बाद ही स्पष्ट होगा।

नाबालिग शिवकुमार के नाम जमीन होने का दावा..

अनावेदक पक्ष के रूप में राजस्व न्यायालय के प्रकरण में शिवकुमार भगत (नाबालिग), पिता/संरक्षक जदुवर राम, निवासी ग्राम जिरहुल का नाम दर्ज है। बंधन राम का कहना है कि वर्ष 1996 में जब कथित रजिस्ट्री हुई, उस समय शिवकुमार की आयु करीब तीन वर्ष थी। भू-स्वामी पक्ष अब इस बात की जांच की मांग कर रहा है कि नाबालिग के नाम कथित विक्रय पत्र किस प्रक्रिया से निष्पादित और पंजीकृत हुआ तथा उससे पहले संबंधित भूमि का नामांतरण किस आधार पर दर्ज किया गया। यह भी जांच का विषय होगा कि उस समय नाबालिग की ओर से विक्रय/क्रय संबंधी दस्तावेज में किसकी भूमिका थी, संरक्षक के रूप में किसे दर्शाया गया था तथा पंजीयन एवं राजस्व रिकॉर्ड में इसके संबंध में क्या दस्तावेज उपलब्ध हैं।

भू-स्वामी का दावा-पूर्वजों के समय से सेटलमेंट जमीन..

भू-स्वामी बंधन राम का कहना है कि विवादित जमीन कोई हाल में प्राप्त संपत्ति नहीं है, बल्कि उनके पूर्वजों के समय से चली आ रही सेटलमेंट जमीन है। उनका दावा है कि उनके पूर्वजों के समय से ही इस जमीन पर उनका परिवार खेती करता आ रहा है और वर्तमान में भी वे जमीन पर अपना अधिकार एवं कब्जा बताते हैं। बंधन राम के अनुसार उन्हें लंबे समय तक राजस्व अभिलेखों में हुए कथित नामांतरण और उसके आधार की जानकारी नहीं थी। जब वर्ष 2025 में जमीन को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ और उन्होंने पुराने राजस्व दस्तावेजों की जानकारी जुटानी शुरू की, तब नामांतरण पंजी एवं अन्य दस्तावेजों के अवलोकन से कथित तौर पर यह तथ्य सामने आया कि रजिस्ट्री से पहले ही नामांतरण दर्ज किया गया था।

अक्टूबर 2025 में शुरू हुआ विवाद..

शिकायत के अनुसार अक्टूबर 2025 में अनावेदक पक्ष द्वारा विवादित भूमि को अपने नाम की भूमि बताते हुए विवाद किए जाने के बाद बंधन राम पक्ष ने राजस्व रिकॉर्ड खंगालना शुरू किया। इसके बाद नामांतरण और कथित विक्रय पत्र को लेकर आपत्ति उठाई गई। शिकायतकर्ता पक्ष का कहना है कि उन्होंने संबंधित दस्तावेजों की नकल प्राप्त की और इसके बाद राजस्व न्यायालय में अपील तथा अन्य स्तरों पर कार्रवाई शुरू की। इसी दौरान कथित विक्रय पत्र की प्रमाणिकता पर भी सवाल उठाए गए।

कथित विक्रय पत्र को फर्जी बताकर पुलिस से शिकायत..

बंधन राम एवं देवनाथ राम की ओर से पुलिस को दिए गए शिकायत आवेदन में वर्ष 1996 के कथित विक्रय पत्र को फर्जी एवं कूटरचित होने का आरोप लगाया गया है। शिकायतकर्ताओं ने दस्तावेज में मौजूद अंगूठे के निशान सहित अन्य बिंदुओं पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि संबंधित व्यक्ति हस्ताक्षर करता है, जबकि कथित दस्तावेज में अंगूठे का निशान होने की बात सामने आई है। इसी आधार पर उन्होंने दस्तावेज की प्रमाणिकता की जांच कराने और दोषी पाए जाने वालों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की मांग की है। हालांकि, इन आरोपों की अभी स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। कथित विक्रय पत्र की सत्यता का निर्धारण मूल पंजीयन रिकॉर्ड, संबंधित दस्तावेज, हस्ताक्षर/अंगूठे के निशान और अन्य साक्ष्यों की जांच के बाद ही किया जा सकता है।

एसडीएम न्यायालय में भी चला प्रकरण..

भूमि के नामांतरण को लेकर बंधन राम की ओर से अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व), कुसमी के न्यायालय में राजस्व प्रकरण क्रमांक 202512270300010/वर्ष 2025-26 में अपील प्रस्तुत की गई थी। मामला अ-6 यानी चालू राजस्व वर्ष के भू-अभिलेखों में नामांतरण से संबंधित था। अपीलार्थी पक्ष ने न्यायालय में कहा था कि वर्ष 1996 में हुए नामांतरण की उन्हें जानकारी नहीं दी गई थी और अक्टूबर 2025 में विवाद उत्पन्न होने के बाद उन्हें इसकी जानकारी हुई। इसके बाद उन्होंने नकल प्राप्त कर अपील प्रस्तुत करने तथा विलंब को क्षमा किए जाने का अनुरोध किया था। वहीं अनावेदक पक्ष ने अपील का विरोध करते हुए कहा था कि भूमि वर्ष 1996 के पंजीकृत विक्रय पत्र के आधार पर खरीदी गई थी और नामांतरण भी उसी आधार पर हुआ था। उनका तर्क था कि करीब 29 वर्ष बाद नामांतरण को चुनौती दी गई है और पंजीकृत विक्रय पत्र को चुनौती देने का क्षेत्राधिकार सिविल न्यायालय का है।

6 मई को एसडीएम कोर्ट ने अपील की खारिज..

अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व), कुसमी ने 6 मई 2026 को आदेश पारित करते हुए धारा 5, परिसीमा अधिनियम के तहत प्रस्तुत विलंब माफी आवेदन को अस्वीकार कर दिया। न्यायालय ने करीब 29 वर्ष बाद नामांतरण को चुनौती दिए जाने और विलंब का पर्याप्त एवं संतोषजनक कारण नहीं पाए जाने के आधार पर अपील को काल-बाधित मानते हुए निरस्त कर दिया। राजस्व न्यायालय का यह आदेश मुख्य रूप से विलंब और परिसीमा के प्रश्न पर आधारित है। इसलिए इसे कथित विक्रय पत्र के फर्जी या वैध होने पर अंतिम न्यायिक निर्णय के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।

अब सामने आया रजिस्ट्री से पहले नामांतरण का दावा..

इस पूरे मामले में नया और महत्वपूर्ण सवाल अब यह है कि यदि राजस्व नामांतरण पंजी में 18 जनवरी 1996 को नामांतरण दर्ज हुआ था और अनावेदक पक्ष के अनुसार संबंधित भूमि का पंजीकृत विक्रय पत्र 19 मार्च 1996 का है, तो दोनों दस्तावेजों के बीच दर्ज तारीखों का कानूनी एवं प्रशासनिक आधार क्या था। भू-स्वामी बंधन राम का कहना है कि यह तथ्य उन्होंने हाल में नामांतरण पंजी की प्रति निकलवाने के बाद सामने आया और इसी कारण अब पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की आवश्यकता है। उनका कहना है कि उनकी जमीन पूर्वजों के समय से चली आ रही सेटलमेंट जमीन है और परिवार पीढ़ियों से उस पर खेती करता रहा है।

जांच में इन बिंदुओं का खुलासा जरूरी..

अब मामले में मूल नामांतरण पंजी, 18 जनवरी 1996 की नामांतरण कार्यवाही का आधार, 19 मार्च 1996 का पंजीकृत विक्रय पत्र, पंजीयन कार्यालय के मूल रिकॉर्ड, उस समय की राजस्व फाइल और संबंधित पक्षों के दस्तावेजों की जांच महत्वपूर्ण होगी। विशेष रूप से यह स्पष्ट होना जरूरी है कि 18 जनवरी 1996 को नामांतरण किस आधार पर दर्ज किया गया था और 19 मार्च 1996 के कथित विक्रय पत्र से उसका क्या संबंध था। यदि दोनों तारीखें दस्तावेजों में इसी प्रकार दर्ज हैं, तो नामांतरण की प्रक्रिया और उसके आधार की जांच पूरे विवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है। फिलहाल बंधन राम पक्ष ने मामले में पुलिस से जांच और कार्रवाई की मांग की है। वहीं राजस्व न्यायालय द्वारा अपील को काल-बाधित होने के आधार पर निरस्त किया जा चुका है। कथित विक्रय पत्र की वास्तविकता और रजिस्ट्री से पहले नामांतरण दर्ज होने के दावे की पुष्टि संबंधित मूल अभिलेखों की जांच के बाद ही हो सकेगी।

किसने क्या कहा..

उक्त मामलें में थाना प्रभारी कुसमी विरासत कुजूर ने कहा आवेदन प्राप्त हुआ हैं। उक्त मामले में पूर्व में एसडीएम एवं तहसील न्यायालय में प्रकरण चलाया जा चूका हैं। आवेदन की जांच की जा रही है।

अनुविभागीय अधिकारी राजस्व कुसमी अनमोल विवेक टोप्पो ने कहा अगर फर्जी रजिस्ट्री हुई है तो सिविल कोर्ट से जिनके पक्ष में फैसला आता है उनके नाम पर राजस्व रिकार्ड दुरुस्त किया जा सकता है. फर्जी रजिस्ट्री सिद्ध करने हेतु राजस्व न्यायालय सक्षम नहीं है।

तीनों पहलू महत्वपूर्ण..

हालांकि आवेदक की ओर से छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री हेल्पलाइन सेवा के पोर्टल में भी ऑनलाइन शिकायत दर्ज की गई है। अब इस तरह मामले में अब पुलिस शिकायत, मुख्यमंत्री हेल्पलाइन में ऑनलाइन शिकायत और पूर्व में हुई राजस्व न्यायालय की कार्यवाही, तीनों पहलू महत्वपूर्ण हो गए हैं। वहीं रजिस्ट्री से करीब दो माह पहले नामांतरण दर्ज होने के दावे की वास्तविकता संबंधित मूल राजस्व एवं पंजीयन अभिलेखों की जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।

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