

मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल मंडला और डिंडोरी जिलों से एक ऐसी प्रेरक कहानी सामने आई है, जिसने न सिर्फ ग्रामीण भारत बल्कि पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। यहां की महिलाओं ने पारंपरिक बीजों को बचाने और जैव विविधता को संरक्षित करने के लिए जो कदम उठाया है, वह आत्मनिर्भरता की नई परिभाषा गढ़ रहा है।
पैसों का नहीं, ‘पुश्तैनी धरोहर’ का बैंक: बदलती सोच की मिसाल
यह कोई सामान्य बैंक नहीं है, जहां नोटों का लेन-देन होता है। यहां असली पूंजी है पारंपरिक बीज, जिन्हें पीढ़ियों से संभालकर रखा गया है। इन बीजों को संरक्षित कर महिलाएं न केवल कृषि परंपरा को बचा रही हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भोजन सुरक्षा की नींव भी मजबूत कर रही हैं।
पांगरी गांव की महिलाओं की ऐतिहासिक पहल
मंडला जिले के बिछिया विकासखंड के पांगरी गांव में महिलाओं ने मिलकर ‘कुटकी रानी उत्पादक बीज बैंक कृषक महिला समिति’ की स्थापना की है। यह पहल केवल एक संगठन नहीं, बल्कि विलुप्त होती कृषि संस्कृति को पुनर्जीवित करने का एक सामूहिक प्रयास है।
इस समूह की महिलाएं अब पारंपरिक बीजों के संरक्षण और आदान-प्रदान के माध्यम से आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।
50 से अधिक दुर्लभ बीजों का खजाना
इस बीज बैंक में 50 से अधिक दुर्लभ और पारंपरिक बीजों का संग्रह किया गया है। इनमें कोदो, कुटकी, सलहार, चावर, गोद पारी और कई स्थानीय किस्में शामिल हैं।
इन बीजों को पारंपरिक मिट्टी की कोठियों में सुरक्षित रखा गया है, जिससे वे कीटों और मौसम के प्रभाव से बचे रहते हैं।
‘मिलेट क्वीन ऑफ इंडिया’ लहरी बाई की प्रेरणा
इस पूरे अभियान की सबसे बड़ी प्रेरणा हैं डिंडोरी की बैगा आदिवासी महिला लहरी बाई पडिया, जिन्हें ‘मिलेट क्वीन ऑफ इंडिया’ के नाम से जाना जाता है।
लहरी बाई ने बिना किसी बड़ी सरकारी मदद के 150 से अधिक दुर्लभ मिलेट प्रजातियों का बीज बैंक तैयार किया है। उनके कार्य की सराहना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति तक कर चुके हैं।
पारंपरिक ज्ञान से बनी अनाज की तिजोरी
ग्रामीण महिलाओं ने अपने पारंपरिक ज्ञान का उपयोग करते हुए मिट्टी की विशेष कोठियां तैयार की हैं, जिन्हें वे अपनी ‘अनाज तिजोरी’ कहती हैं। इसमें विभिन्न प्रकार के मोटे अनाज और स्थानीय बीज सुरक्षित रखे गए हैं, जो कृषि विरासत का जीवंत उदाहरण हैं।
रोजगार और आत्मनिर्भरता की नई राह
यह बीज बैंक सिर्फ संरक्षण का माध्यम नहीं है, बल्कि स्थानीय महिलाओं के लिए रोजगार और आर्थिक सशक्तिकरण का नया रास्ता भी खोल रहा है। बीजों के आदान-प्रदान और संरक्षण से गांवों में नई आर्थिक गतिविधियां विकसित हो रही हैं।
जड़ों से जुड़कर भविष्य को सुरक्षित करने की सीख
मंडला की इन महिलाओं ने यह साबित कर दिया है कि आधुनिकता के साथ-साथ यदि अपनी परंपराओं और स्थानीय ज्ञान को अपनाया जाए, तो पर्यावरण संरक्षण और आत्मनिर्भरता दोनों संभव हैं। यह पहल ग्रामीण भारत के लिए एक मजबूत और प्रेरणादायक मॉडल बनकर उभरी है।




















