
Supreme Court Justice Ujjal Bhuyan: पिछले कुछ समय में देश के अलग-अलग हिस्सों में शिक्षा व्यवस्था, भर्ती परीक्षाओं और पेपर लीक जैसे मुद्दों को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए हैं। कई जगह इन प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के दौरान पुलिस की सख्त कार्रवाई भी सामने आई। लाठीचार्ज से लेकर प्रदर्शनकारियों के साथ मारपीट तक के वीडियो और घटनाओं ने पुलिस के रवैये को लेकर सवाल खड़े किए हैं। इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने गंभीर चिंता जताई है।
IPS अधिकारियों के प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई करने पर जताई चिंता
जस्टिस उज्जल भुइयां ने कहा कि यदि IPS स्तर के अधिकारी भी प्रदर्शनकारियों पर हमला करते हुए दिखाई दें तो यह बेहद चिंताजनक स्थिति है। उन्होंने कहा कि पुलिस से हमेशा निष्पक्ष और कानून के अनुरूप व्यवहार की उम्मीद की जाती है, लेकिन कई घटनाओं में यह भावना कमजोर होती नजर आ रही है।उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पुलिस को अपनी कार्यशैली और रवैये पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। कानून व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है, लेकिन इस दौरान नागरिकों के अधिकारों और गरिमा की रक्षा भी उतनी ही जरूरी है।
हिरासत में मौत और फर्जी एनकाउंटर को बताया गंभीर अपराध
जस्टिस भुइयां ने हिरासत में मौत और फर्जी एनकाउंटर के मामलों को भी बेहद गंभीर बताया। उन्होंने कहा कि किसी भी सभ्य समाज में पुलिस हिरासत में किसी व्यक्ति की मौत को सामान्य घटना नहीं माना जा सकता।उन्होंने स्पष्ट किया कि पुलिस किसी भी परिस्थिति में हिरासत में लिए गए व्यक्ति के साथ यातना या अमानवीय व्यवहार नहीं कर सकती। गिरफ्तारी के बाद भी व्यक्ति के मौलिक अधिकार समाप्त नहीं हो जाते। जीवन और गरिमा का अधिकार कानून के तहत कायम रहता है।
गिरफ्तारी के बाद क्या खत्म हो जाता है जीवन का अधिकार?
जस्टिस भुइयां ने इसी संदर्भ में अहम सवाल उठाया कि क्या पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बाद किसी व्यक्ति का जीवन का अधिकार खत्म हो जाता है। इसका जवाब स्पष्ट रूप से नहीं है। कानून प्रवर्तन एजेंसियों को अपनी शक्तियों का इस्तेमाल संवैधानिक सीमाओं के भीतर रहकर करना होता है।
पुलिस की भूमिका और जवाबदेही पर फिर उठी बहस
जस्टिस भुइयां की टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब प्रदर्शनकारियों से निपटने के पुलिस के तौर-तरीकों को लेकर देश में बहस चल रही है। इससे पहले भी वह पुलिस कार्रवाई, हिरासत में अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता जैसे मुद्दों पर चिंता व्यक्त कर चुके हैं।उनकी टिप्पणी का व्यापक संदेश यही है कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर पुलिस की कार्रवाई मनमानी नहीं हो सकती। प्रदर्शन हो या गिरफ्तारी, हर परिस्थिति में संवैधानिक अधिकारों, मानवीय गरिमा और निष्पक्षता को प्राथमिकता देना जरूरी है।




















