

अभिषेक कुमार सोनी ✍️
रायपुर/बलरामपुर। देश आज 24 अप्रैल को राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस मना रहा है।छत्तीसगढ़ के बलरामपुर-रामानुजगंज जिले में पंचायती राज व्यवस्था ग्रामीण विकास की मुख्य आधारशिला मानी जाती है। गांव स्तर पर ग्राम पंचायत, जनपद स्तर पर जनपद पंचायत और जिला स्तर पर जिला पंचायत के माध्यम से प्रशासनिक ढांचा संचालित हो रहा है, जो स्थानीय जरूरतों के अनुसार विकास कार्यों को आगे बढ़ाता है।पंचायतों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी को लोकतंत्र की बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत अब भी कई सवाल खड़े करती है। कई स्थानों पर निर्वाचित महिला सरपंच केवल नाममात्र की प्रमुख रह जाती हैं, जबकि वास्तविक निर्णय उनके पति या परिवार के पुरुष सदस्य लेते हैं, जिसे आम बोलचाल में “सरपंच पति” कहा जाता है।
ग्रामीण इलाकों में अक्सर देखा जाता है कि पंचायत बैठकों में महिला सरपंच की जगह उनके पति उपस्थित रहते हैं, सरकारी अधिकारियों से संवाद करते हैं और योजनाओं के निर्णय भी वही लेते हैं। कई मामलों में दस्तावेजों पर हस्ताक्षर तो महिला सरपंच के होते हैं, लेकिन फैसले पहले ही तय हो चुके होते हैं।यह स्थिति केवल प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक मानसिकता से जुड़ी चुनौती भी है, जहां महिलाओं को नेतृत्व की भूमिका में स्वीकार करने में अभी भी झिझक बनी हुई है।
पंचायती राज को संवैधानिक मजबूती देने वाला 73वां संविधान संशोधन 24 अप्रैल 1993 से लागू हुआ। इसके जरिए संविधान में भाग-IX अनुच्छेद 243 से 243-O जोड़ा गया, जिसमें पंचायतों की संरचना, अधिकार और चुनाव की स्पष्ट व्यवस्था की गई। इसके तहत त्रिस्तरीय प्रणाली ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत समिति और जिला परिषद लागू हुई तथा ग्राम सभा को आधार इकाई का दर्जा मिला। पंचायतों के हर पांच वर्ष में चुनाव अनिवार्य किए गए, साथ ही राज्य चुनाव आयोग और राज्य वित्त आयोग की व्यवस्था भी की गई।
इस संशोधन की सबसे बड़ी उपलब्धि आरक्षण व्यवस्था रही है, जिसके तहत अनुसूचित जाति, जनजाति और कम से कम 33 प्रतिशत महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित की गईं।जिसे कई राज्यों ने बढ़ाकर 50 प्रतिशत तक कर दिया गया। इसके बाद बड़ी संख्या में महिलाएं सरपंच और जनप्रतिनिधि बनकर सामने आईं, इसका उद्देश्य महिलाओं को राजनीतिक रूप से सशक्त बनाना था। इसके अलावा 11वीं अनुसूची के तहत पंचायतों को 29 विषयों जैसे कृषि, जल, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षापर कार्य करने का अधिकार दिया गया।हालांकि, सामाजिक ढांचे और पारंपरिक सोच के कारण कई जगह महिलाओं की स्वतंत्र भूमिका सीमित रह जाती है। यह समस्या केवल कानून की नहीं, बल्कि सामाजिक मानसिकता से भी जुड़ी है, जहां महिलाओं को निर्णय लेने की पूर्ण स्वतंत्रता नहीं मिल पाती। अशिक्षा को भी एक प्रमुख कारण माना जाता है, जिससे उनके अधिकारों का वास्तविक उपयोग प्रभावित होता है।
फिर भी बदलाव की तस्वीर पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। जिले में कई पंचायतें ऐसी भी है जिनमें महिला सरपंच स्वयं नेतृत्व कर रही हैं और विकास कार्यों में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। सरकार और प्रशासन भी प्रशिक्षण, जागरूकता और निगरानी के जरिए महिला प्रतिनिधियों को सशक्त बनाने की दिशा में प्रयासरत हैं।महिलाओं को वास्तविक अधिकार, फैसले लेने की आज़ादी और समाज का समर्थन भी जरूरी है। तभी पंचायती राज व्यवस्था सच में मजबूत और प्रभावी बन पाएगी।

































