
जबलपुर: मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण देने से जुड़े मामले में हाईकोर्ट में सुनवाई पूरी हो चुकी है। अदालत की विशेष युगलपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद 5 अगस्त 2026 को फैसला सुरक्षित रख लिया था। इस मामले का प्रदेश में सरकारी भर्तियों और लंबित नियुक्तियों पर महत्वपूर्ण असर पड़ सकता है।
2019 में 14% से बढ़ाकर 27% किया गया था आरक्षण
मध्य प्रदेश की तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने वर्ष 2019 में ओबीसी आरक्षण को 14 फीसदी से बढ़ाकर 27 फीसदी करने का फैसला लिया था। इस निर्णय को अदालत में चुनौती दी गई। इसके बाद आरक्षण की संवैधानिक वैधता को लेकर लंबे समय तक कानूनी प्रक्रिया चलती रही।
50% आरक्षण सीमा पर भी हुई बहस
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान आरक्षण की कुल सीमा, ओबीसी वर्ग की आबादी, सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आंकड़ों तथा संवैधानिक प्रावधानों पर दलीलें दी गईं। दोनों पक्षों ने अपने-अपने तर्क अदालत के सामने रखे।
13% पदों पर क्यों अटकी हैं नियुक्तियां?
आरक्षण विवाद के चलते सरकारी भर्तियों में 87 फीसदी पदों पर नियुक्तियों की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई, जबकि शेष 13 फीसदी पदों को विवाद के अंतिम निपटारे तक रोककर रखा गया। इस व्यवस्था का उद्देश्य विवाद के समाधान तक नियुक्तियों की प्रक्रिया को आंशिक रूप से जारी रखना था।
अब आगे क्या होगा?
फैसला सुरक्षित रखे जाने के बाद अभ्यर्थियों की नजर हाईकोर्ट के अंतिम निर्णय पर है। अदालत का फैसला आने के बाद ही 27 फीसदी आरक्षण की वैधता और लंबित पदों पर नियुक्तियों के संबंध में आगे की स्थिति स्पष्ट होगी।




















