

प्री-सेंसरशिप पर रोक से लेकर डिजिटल युग की चुनौतियों तक कहानी जारी
अभिषेक कुमार सोनी ✍️
नई दिल्ली: स्वतंत्र भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर स्पष्ट दिशा तय करने वाले दो अहम फैसले बृज भूषण बनाम दिल्ली राज्य और रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य आज भी लोकतंत्र और मीडिया की स्वतंत्रता के मूल आधार माने जाते हैं। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 1950 में दिए इन निर्णयों में साफ कर दिया था कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत दी गई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता केवल सैद्धांतिक अधिकार नहीं, बल्कि व्यवहारिक रूप से संरक्षित अधिकार है और सरकार इसे मनमाने तरीके से सीमित नहीं कर सकती।
स्वतंत्र भारत के शुरुआती वर्षों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की वास्तविक सीमा क्या होगी यह एक बड़ा संवैधानिक प्रश्न था। इसी संदर्भ में ब्रिज भूषण बनाम दिल्ली राज्य का यह फैसला भारतीय लोकतंत्र और प्रेस की स्वतंत्रता के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुआ। इस मामले में भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सरकार प्रेस पर पूर्व सेंसरशिप लागू नहीं कर सकती।1947 के बाद देश सामाजिक और राजनीतिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा था। इसी समय ‘ऑर्गेनाइजर’ नामक साप्ताहिक अखबार, जो सरकार की नीतियों और घटनाओं पर तीखी टिप्पणी प्रकाशित कर रहा था।सरकार को आशंका थी कि इस तरह की सामग्री से सांप्रदायिक तनाव पबढ़ सकता है। इसके चलते प्रशासन ने कड़ा कदम उठाया।दिल्ली के चीफ कमिश्नर ने ईस्ट पंजाब पब्लिक सेफ्टी एक्ट, 1949 के तहत आदेश जारी किया कि अखबार को हर प्रकाशित होने वाली सामग्री पहले सरकारी अधिकारियों को दिखानी होगी बिना अनुमति कोई भी सामग्री प्रकाशित नहीं की जा सकेगी यह आदेश सीधे तौर पर प्री-सेंसरशिप लागू करता था।
इस आदेश को अखबार के संपादक बृज भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।उन्होंने तर्क दिया कि यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत दी गई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन हैसरकार प्रेस को पहले से नियंत्रित नहीं कर सकती यह लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के आदेश को असंवैधानिक घोषित करते हुए कहा कि पूर्व सेंसरशिप अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रत्यक्ष उल्लंघन है प्रेस को बिना सरकारी हस्तक्षेप के प्रकाशित करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए सरकार केवल अनुच्छेद 19(2) में दिए गए सीमित आधारों पर ही प्रतिबंध लगा सकती है।
इसी क्रम में रमेश थापर 1950 स्वतंत्र भारत का एक महत्वपूर्ण संवैधानिक मामला है, जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाओं को स्पष्ट किया। पत्रकार रोमेश थापर की पत्रिका कोर्स रोड्स के मद्रास राज्य में प्रवेश और प्रसार पर सरकार ने यह कहकर प्रतिबंध लगा दिया कि इससे सार्वजनिक सुरक्षा को खतरा है, लेकिन जब मामला भारतीय सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचा, तो अदालत ने यह कहते हुए प्रतिबंध को असंवैधानिक घोषित कर दिया कि उस समय संविधान के अनुच्छेद 19(2) में “पब्लिक ऑर्डर” या “सार्वजनिक सुरक्षा” जैसे आधार शामिल नहीं थे, इसलिए इस आधार पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित नहीं किया जा सकता। इस फैसले ने यह सिद्धांत स्थापित किया कि सरकार केवल उन्हीं स्पष्ट और संवैधानिक आधारों पर ही अभिव्यक्ति पर रोक लगा सकती है, और मनमाना प्रतिबंध लोकतंत्र के मूल मूल्यों के विरुद्ध है।
इन ऐतिहासिक निर्णयों के बाद भारतीय मीडिया का स्वरूप बदल गया
इन दोनों फैसलों का व्यापक प्रभाव देश के मीडिया परिदृश्य पर पड़ा। ब्रिटिश शासनकाल से चली आ रही सेंसरशिप और नियंत्रण की परंपरा को समाप्त करते हुए प्रेस को स्वतंत्र रूप से कार्य करने का अधिकार मिला। मीडिया ने सरकार की नीतियों की आलोचना करने और जनहित के मुद्दों को उठाने में अधिक सक्रिय भूमिका निभानी शुरू की। लोकतंत्र में प्रेस को “चौथे स्तंभ” के रूप में स्थापित करने में इन निर्णयों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।हालांकि, इन फैसलों के बाद सरकार ने 1951 में पहला संविधान संशोधन लाकर अनुच्छेद 19(2) के दायरे को विस्तारित किया, जिसमें “पब्लिक ऑर्डर”, “राज्य की सुरक्षा” और अन्य आधार शामिल किए गए। इसे न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच संतुलन स्थापित करने की कोशिश के रूप में देखा गया, लेकिन इसके बावजूद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मूल भावना बरकरार रही।
डिजिटल मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक मार्गदर्शक सिद्धांतों के असर आज भी कायम
वर्तमान समय में जब मीडिया का स्वरूप तेजी से बदलकर डिजिटल और सोशल प्लेटफॉर्म तक फैल चुका है, तब इन फैसलों की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है। आज फेक न्यूज, ऑनलाइन कंटेंट रेगुलेशन, राष्ट्रीय सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन को लेकर बहस जारी है। कई बार सोशल मीडिया पोस्ट, समाचार रिपोर्ट या डिजिटल कंटेंट पर कार्रवाई को लेकर सवाल उठते हैं कि क्या यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आता है या नहीं।ऐसे दौर में सुप्रीम कोर्ट लगातार इन मूल सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए निर्णय देता रहा है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि नागरिकों की स्वतंत्रता सुरक्षित रहे और साथ ही सार्वजनिक व्यवस्था भी बनी रहे। विशेषज्ञों का मानना है कि 1950 के ये फैसले आज भी न्यायपालिका के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में कार्य करते हैं।
स्पष्ट है कि सर्वोच्च न्यायालय के इन दो निर्णयों ने यह स्थापित कर दिया कि लोकतंत्र में नागरिकों की आवाज को पहले से दबाया नहीं जा सकता। बदलते समय और नई चुनौतियों के बावजूद इन ऐतिहासिक निर्णयों की प्रासंगिकता आज भी उतनी ही मजबूत बनी हुई है।आज, बदलते मीडिया परिदृश्य और नई चुनौतियों के बावजूद, इन फैसलों की प्रासंगिकता बरकरार है और यही भारतीय लोकतंत्र की मजबूती का आधार भी है।































