बिलासपुर/बलरामपुर।बलरामपुर जिले के राजपुर जनपद पंचायत में पदस्थ सहायक श्रेणी-lll संतोष मिश्रा ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय बिलासपुर में थाना प्रभारी राजपुर व भाजपा मंडल अध्यक्ष जगवंशी यादव के विरुद्ध अपील किया था। न्यायमूर्ति संजय कुमार जायसवाल ने क्लीन चीट दिया।

अपीलार्थी संतोष मिश्रा जनपद पंचायत राजपुर में सहायक श्रेणी-III के पद पर कार्यरत है। बलरामपुर-रामानुजगंज क्षेत्र के निर्वाचित विधायक जो वर्तमान में मंत्री पद पर आसीन हैं तथा उसी जिले के विधानसभा सामरी क्षेत्र की महिला विधायक जो अनुसूचित जनजाति वर्ग से संबंधित हैं। उक्त दोनों जनप्रतिनिधि छत्तीसगढ़ शासन के सत्तारूढ़ राजनीतिक दल, भारतीय जनता पार्टी के सदस्य हैं तथा आदिवासी समाज से संबंध रखते हैं। शिकायतकर्ता जगवंशी यादव भारतीय जनता पार्टी के राजपुर मंडल के अध्यक्ष हैं। 17 जुलाई 2025 को उन्हें भारतीय जनता पार्टी के बरियों मंडल अध्यक्ष जितेन्द्र जायसवाल द्वारा 'व्हाट्सऐप' एवं दूरभाष के माध्यम से यह सूचना दी गई कि अपीलार्थी द्वारा 'मंत्री  एवं 'विधायक' के प्रति खुलेआम जातिसूचक गाली-गलौज करते हुए आदिवासी समाज तथा भारतीय जनता पार्टी को अपमानित किया गया, जिससे क्षेत्र में आक्रोश व्याप्त हो गया। उक्त शिकायत के आधार पर थाना राजपुर में उसी दिन केस दर्ज किया गया। विवेचना के दौरान शिकायतकर्ता से संबंधित ध्वनि-अंकन (ऑडियो क्लिप) युक्त पेन ड्राइव जब्त की गई, जिसके संबंध में भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 63 (4) (ग) के अंतर्गत प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया गया। साथ ही अपीलार्थी का नियुक्ति प्रमाणपत्र जब्त किया गया, साक्षियों के कथन लेखबद्ध किए गए तथा विवेचना उपरांत अभियोगपत्र प्रस्तुत किया गया। भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 296 के अंतर्गत आरोप के लिए आवश्यक 'अश्लीलता' तथा 'लोक स्थान अथवा उसके समीप' होने के तत्व प्रथमदृष्टया स्थापित नहीं होते, अतः उक्त धारा के अंतर्गत आरोप की रचना विधिसंगत नहीं है। यह तर्क दिया गया है कि 'मंत्री का पुलिस द्वारा कथन नहीं लिया गया है तथा महिला विधायक द्वारा इस अपील में अनापत्ति व्यक्त की गयी है। यह भी तर्क किया गया है कि शिकायतकर्ता जगवंशी यादव इस प्रकरण में पीड़ित की श्रेणी में नहीं आते, अतः उनके द्वारा प्रस्तुत शिकायत विधि की दृष्टि में ग्राह्य नहीं है। यह भी तर्क किया गया है कि विशेष अधिनियम के अंतर्गत यह आवश्यक है कि कथित अपराध लोक दृष्टि में आने वाले स्थान पर घटित हुआ हो, जिसे अभियोजन द्वारा प्रथमदृष्टया स्थापित नहीं किया गया है। इस संबंध में कोई विशेष या स्पष्ट साक्ष्य संकलित नहीं किया गया है। कथित ध्वनि-अंकन (ऑडियो क्लिप) का न तो लिप्यांतरण किया गया है और न ही यह स्पष्ट है कि उसमें कौन-कौन से शब्द प्रयुक्त हुए हैं। यह भी स्पष्ट नहीं है कि उक्त ध्वनि-अंकन किसके द्वारा प्रसारित किया गया, किस स्थान पर तैयार किया गया तथा किस स्थान पर सुना गया। विद्वान अधिवक्ता का यह भी तर्क है कि विवेचना के दौरान कथित घटनास्थल का कोई नक्शा तैयार नहीं किया गया, जिससे उसे 'लोक दृष्टि में आने वाले स्थान' के रूप में स्थापित किया जा सके। साथ ही, कथित जातिसूचक गाली-गलौज किसी विशिष्ट व्यक्ति के समक्ष किए जाने का भी कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। अपीलार्थी की आवाज का नमूना नहीं लिया गया, न ही उसका कोई दूरभाष उपकरण जब्त किया गया है, और न ही ऐसा कोई साक्ष्य संकलित किया गया है जिससे यह स्थापित हो सके कि उक्त ध्वनि-अंकन का प्रसारण अपीलार्थी द्वारा किया गया। उपर्युक्त परिस्थितियों में यह तर्क दिया गया है कि धारा 296 भारतीय न्याय संहिता एवं विशेष अधिनियम की धारा 3 (1) (ध) के आवश्यक तत्वों की पूर्ति नहीं होती है, तथा उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर विचारण जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। अतः अपील स्वीकार करते हुए 'प्रश्नाधीन आदेश' अपास्त किया गया तथा अपीलार्थी को आरोपित अपराध से उन्मुक्त किया गया।

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