

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दुष्कर्म की शिकार 14 वर्ष 6 माह की नाबालिग के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए 28 सप्ताह से अधिक अवधि के गर्भ का चिकित्सकीय समापन कराने की अनुमति दे दी है। अदालत ने राजनांदगांव के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी को निर्देश दिया है कि निर्धारित चिकित्सकीय मानकों का पालन करते हुए एक सप्ताह के भीतर सुरक्षित गर्भपात की प्रक्रिया पूरी कराई जाए और दो सप्ताह के भीतर इसकी अनुपालन रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत की जाए।
दुष्कर्म के बाद धमकी के कारण लंबे समय तक नहीं बता सकी घटना
मामला राजनांदगांव जिले के डोंगरगांव थाना क्षेत्र का है। याचिका के अनुसार दिसंबर 2025 में आरोपी ने नाबालिग को बहला-फुसलाकर उसके साथ दुष्कर्म किया। आरोपी की धमकियों के कारण पीड़िता लंबे समय तक इस घटना की जानकारी अपने परिजनों को नहीं दे सकी।बाद में जून 2026 में पेट दर्द की शिकायत होने पर परिजन उसे अस्पताल लेकर पहुंचे। जांच और सोनोग्राफी में उसके गर्भवती होने का पता चला। इसके बाद पीड़िता के पिता की शिकायत पर पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता और पॉक्सो कानून के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू की।
मेडिकल बोर्ड ने बताई थी जोखिम की स्थिति
गर्भपात की अनुमति के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर किए जाने के बाद अदालत के निर्देश पर राजनांदगांव जिला अस्पताल में मेडिकल बोर्ड गठित किया गया। बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि पीड़िता का गर्भ 28 सप्ताह 5 दिन का है।विशेषज्ञों ने कहा कि गर्भ की अवधि अधिक होने और पीड़िता की कम उम्र के कारण गर्भपात की प्रक्रिया जोखिमपूर्ण हो सकती है। इसमें अत्यधिक रक्तस्राव और संक्रमण की आशंका है। वहीं गर्भ को जारी रखना भी नाबालिग के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है।
महिला की इच्छा के विरुद्ध गर्भ जारी रखना मौलिक अधिकारों के खिलाफ
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी महिला या नाबालिग को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भ जारी रखने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त जीवन, गरिमा, स्वतंत्रता और शारीरिक स्वायत्तता के अधिकार का उल्लंघन होगा। न्यायालय ने माना कि प्रजनन संबंधी निर्णय भी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हिस्सा हैं।
विशेषज्ञ चिकित्सकों की निगरानी में होगी पूरी प्रक्रिया
हाईकोर्ट ने राजनांदगांव के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी को निर्देश दिया है कि पीड़िता के पिता से तत्काल संपर्क कर आवश्यक प्रशासनिक सहायता उपलब्ध कराई जाए। साथ ही किसी पूर्ण सुविधा वाले सरकारी अस्पताल में एक सप्ताह के भीतर गर्भपात कराया जाए।अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पूरी प्रक्रिया दो महिला स्त्री रोग विशेषज्ञों और एक सर्जन की विशेष टीम की निगरानी में कराई जाए, ताकि पीड़िता की सुरक्षा और सभी चिकित्सकीय मानकों का पालन सुनिश्चित हो सके।
संवेदनशील मामलों में पीड़िता के अधिकारों को प्राथमिकता
अपने आदेश में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में पीड़िता की गरिमा, स्वास्थ्य और सुरक्षा सर्वोपरि है। अदालत का यह निर्णय न केवल कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि संवेदनशील मामलों में पीड़ित के मौलिक अधिकारों और मानवीय गरिमा की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है।











