

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से लेकर सूचना के अधिकार तक कानूनी संरक्षण मौजूद, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में लागू करने की स्थिति पर उठते सवाल
नई दिल्ली/रायपुर/बलरामपुर/विशेष रिपोर्ट। देश आज डॉ. भीमराव आंबेडकर की जयंती मना रहा है।वह व्यक्तित्व जिसने भारतीय लोकतंत्र को संविधान के रूप में मजबूत आधार दिया। इसी संविधान ने पत्रकारों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी, जिसके कारण मीडिया को “लोकतंत्र का चौथा स्तंभ” कहा जाता है। हालांकि, अधिकारों की यह संरचना जितनी मजबूत कागज़ों में दिखती है, उतनी ही जमीनी स्तर पर कई जगहों पर चुनौतीपूर्ण नजर आती है, खासकर छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में।
भारत में पत्रकारों को कई महत्वपूर्ण संवैधानिक एवं कानूनी अधिकार प्राप्त हैं। सबसे प्रमुख अधिकार अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मिलने वाली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, जिसके माध्यम से पत्रकार स्वतंत्र रूप से समाचार लिख सकते हैं, प्रकाशित कर सकते हैं और सरकार की नीतियों की आलोचना कर सकते हैं। वहीं अनुच्छेद 19(2) के तहत इस स्वतंत्रता पर राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, मानहानि और न्यायालय की अवमानना जैसे आधारों पर प्रतिबंध भी लगाए जा सकते हैं।
सूचना तक पहुंच पत्रकारों के लिए सबसे प्रभावी औजार मानी जाती है। सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत पत्रकार किसी भी सरकारी विभाग से रिकॉर्ड, दस्तावेज़ और फाइल नोटिंग प्राप्त कर सकते हैं, जिससे प्रशासनिक पारदर्शिता सुनिश्चित होती है। लेकिन छत्तीसगढ़ के कई जिलों—विशेषकर सरगुजा और बलरामपुर क्षेत्र—में पत्रकारों का अनुभव बताता है कि आरटीआई के जवाब में देरी, अधूरी जानकारी या तकनीकी आधार पर निरस्तीकरण जैसी समस्याएं अब भी आम हैं।
प्रेस के संचालन और पंजीकरण के लिए प्रेस एवं पुस्तक पंजीकरण अधिनियम 1867 लागू होता है, जबकि प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया पत्रकारिता के मानकों की निगरानी करता है और शिकायतों की सुनवाई करता है। बावजूद इसके, स्थानीय स्तर पर पत्रकारों को त्वरित संरक्षण या न्याय मिलने में अक्सर देरी देखने को मिलती है।
डिजिटल युग में ऑनलाइन पत्रकारिता तेजी से बढ़ी है, जिस पर सूचना प्रौद्योगिकी नियम 2021 लागू होते हैं। इन नियमों के तहत डिजिटल मीडिया संस्थानों को कंटेंट की जिम्मेदारी तय करनी होती है, लेकिन छोटे और स्वतंत्र पोर्टलों के लिए यह कई बार अतिरिक्त कानूनी दबाव भी बन जाता है।
कानूनी दृष्टि से पत्रकारों को अदालत की कार्यवाही रिपोर्ट करने का अधिकार है, लेकिन न्यायालय की अवमानना से बचना आवश्यक है। इसी प्रकार, मानहानि के मामलों में सत्यता और जनहित पत्रकार के प्रमुख बचाव माने जाते हैं।
जमीनी स्तर पर सबसे बड़ी चुनौती सुरक्षा और कार्य परिस्थितियों की बनी हुई है। छत्तीसगढ़ में पत्रकारों के लिए कोई व्यापक और प्रभावी सुरक्षा कानून लागू नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत पत्रकारों को कई बार दबाव, धमकी और संसाधनों की कमी का सामना करना पड़ता है। वहीं वर्किंग जर्नलिस्ट्स एंड अदर न्यूज़पेपर एम्प्लॉइज एक्ट 1955 के प्रावधानों के बावजूद छोटे शहरों में वेतन और श्रम अधिकारों का पूर्ण पालन नहीं हो पा रहा है।
वरिष्ठ मीडिया विश्लेषकों का मानना है कि पत्रकारों को जहां एक ओर व्यापक अधिकार प्राप्त हैं, वहीं दूसरी ओर उन्हें फेक न्यूज से बचना, सामाजिक सौहार्द बनाए रखना और तथ्यों की पुष्टि के बाद ही खबर प्रकाशित करना अनिवार्य है।
आंबेडकर जयंती के अवसर पर यह सवाल और भी प्रासंगिक हो जाता है कि क्या संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार वास्तव में जमीनी स्तर तक पहुंच पा रहे हैं। भारत में पत्रकारों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सूचना तक पहुंच और रिपोर्टिंग के अधिकार तो प्राप्त हैं, लेकिन इन अधिकारों का प्रभावी उपयोग तभी संभव है जब सुरक्षा, पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही भी समान रूप से मजबूत हो।
लेखक परिचय
अभिषेक कुमार सोनी
ऑल मीडिया प्रेस एसोसिएशन के सरगुजा संभाग अध्यक्ष एवं छत्तीसगढ़ श्रमजीवी पत्रकार कल्याण संघ, राजपुर के प्रवक्ता हैं। साथ ही वे संचार टुडे सीजीएमपी न्यूज़ के स्टेट हेड के रूप में सक्रिय रूप से कार्यरत हैं। इन्होंने पत्रकारिता में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त की है और निष्पक्ष, तथ्यात्मक एवं जनपक्षीय रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं।

































