नई दिल्ली: जुलाई में हुए छात्र प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कथित बर्बरता के आरोपों की जांच कर रही उच्चाधिकार प्राप्त समिति (HPEC) को अब तक बेहद कम शिकायतें मिली हैं। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस पर चिंता जताई। अदालत ने कहा कि अधिकारों के उल्लंघन, शारीरिक हमले या हिंसा की शिकायत लेकर बहुत कम लोग समिति के सामने पहुंचे हैं। पीठ ने वकीलों से प्रभावित लोगों को शिकायत दर्ज कराने के लिए प्रोत्साहित करने को कहा। साथ ही समिति को याचिकाकर्ताओं की ओर से पीड़ितों के समर्थन में जमा किए गए वीडियो और अन्य दस्तावेजों की जांच करने की अनुमति दे दी।
CJI सूर्यकांत की पीठ ने समिति की रिपोर्ट पर की चर्चा
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने मामले की सुनवाई की। इस दौरान अदालत को समिति की अब तक की कार्रवाई की जानकारी दी गई। रिपोर्ट का सार पढ़ते हुए CJI ने बताया कि समिति ने 29 अक्टूबर को अपने कार्यालय में बैठक की थी। इस बैठक की सूचना प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में विज्ञापन के माध्यम से दी गई थी।पीठ ने समिति को याचिकाकर्ताओं की ओर से उपलब्ध कराए गए वीडियो क्लिप और अन्य सामग्री की पड़ताल करने की मंजूरी दी।
याचिकाकर्ताओं ने उठाया विभागीय जांच और FIR का मुद्दा
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एन हरिहरन ने कहा कि याचिका प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कथित बर्बरता से संबंधित है। उन्होंने दलील दी कि उस समय हुई घटनाओं को लेकर न तो कोई विभागीय जांच की गई और न ही कोई मामला दर्ज हुआ। उनके मुताबिक, यह ऐसा मुद्दा है जिस पर अदालत को प्रथम दृष्टया विचार करना चाहिए। उन्होंने महिलाओं के साथ शारीरिक हमले होने का आरोप भी लगाया।वहीं, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि उस दौरान 250 पुलिस अधिकारी भी घायल हुए थे।
पोर्टल पर मिलीं कुछ शिकायतें, ईमेल और डाक से कोई आवेदन नहीं
CJI ने कहा कि समिति की कोशिशों के बावजूद करीब तीन सप्ताह पहले शुरू किए गए विशेष पोर्टल पर केवल कुछ शिकायतें ही दर्ज हुई हैं। ईमेल, डाक या व्यक्तिगत रूप से सामग्री जमा करने के माध्यम से कोई शिकायत नहीं मिली।पीठ ने कहा कि फिलहाल सबसे जरूरी है कि प्रभावित लोग अपनी शिकायतें समिति तक पहुंचाएं। इसके लिए पोर्टल और विशेष ईमेल पता उपलब्ध कराया गया है। शिकायतें मिलने के बाद समिति उनकी जांच कर सकती है।अदालत ने बताया कि अब तक केवल एक शिकायतकर्ता समिति के सामने पेश हुआ है और उसने हलफनामा दिया है। कुछ पुलिसकर्मी भी समिति के समक्ष अपनी बात रख चुके हैं। पीठ के अनुसार, समिति अब शिकायतों की पड़ताल शुरू कर तथ्य जुटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाएगी।
जस्टिस बागची ने शिकायतों की कमी पर जताई हैरानी
जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि समिति ने अपनी रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख किया है कि ऑनलाइन या व्यक्तिगत रूप से बहुत कम लोग ऐसे सामने आए हैं, जिन्होंने अपने अधिकारों के हनन या पुलिस अधिकारियों की ओर से शारीरिक हमले और हिंसा का आरोप लगाया हो।इस पर याचिकाकर्ताओं के वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि यह तस्वीर पूरी तरह सही नहीं है। उन्होंने बताया कि मुख्य मामले में पोर्टल शुरू होने से पहले ही अभ्यावेदन दाखिल किया गया था। पोर्टल चालू होने के बाद उसके दिशा-निर्देशों के अनुसार भी आवेदन जमा किया गया था।
वकीलों ने कहा- अदालत में मौजूद सामग्री समिति को दी जा सकती है
कुछ याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने कहा कि कई जरूरी दस्तावेज और सामग्री पहले से ही अदालत के रिकॉर्ड में मौजूद हैं। इन्हें हर प्रभावित व्यक्ति को अलग से समिति के सामने पेश होने के लिए कहे बिना भी जांच के लिए उपलब्ध कराया जा सकता है।उन्होंने कहा कि समिति उन व्यापक उल्लंघनों की जांच कर रही है, जिनकी जानकारी पहले से सार्वजनिक है। ग्रोवर ने यह भी दलील दी कि विशिष्ट घटनाओं को लेकर FIR दर्ज होनी चाहिए, लेकिन अब तक एक भी FIR दर्ज नहीं की गई है।उनके मुताबिक, जब पीड़ितों की शिकायत पर वास्तविक आपराधिक प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है, तब उनसे समिति के सामने पेश होकर अपना पक्ष रखने की अपेक्षा करना उचित नहीं है। अदालत में उपलब्ध सामग्री समिति को भेजी जा सकती है, ताकि वह उसके आधार पर जांच शुरू कर सके।
पीड़ितों को शिकायत दर्ज कराने के लिए प्रेरित करने की अपील
पीठ ने मौखिक टिप्पणी करते हुए सभी पक्षों से प्रभावित लोगों को आगे आने के लिए प्रेरित करने का अनुरोध किया। अदालत ने कहा कि ऐसा लगता है कि लोगों तक पहुंचने या उनकी ओर से दस्तावेज और आंकड़े समिति तक पहुंचाने में कहीं न कहीं कमी रह गई है।इस पर गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि उनकी ओर से सभी सामग्री तीन बार जमा की जा चुकी है।
गोपनीय शिकायत के लिए पोर्टल पर अलग व्यवस्था
सुप्रीम कोर्ट ने समिति की 31 अक्टूबर की कार्रवाई रिपोर्ट का भी संज्ञान लिया और उसे अदालत में खोला। पीठ ने बताया कि पोर्टल पर गोपनीय तरीके से दर्ज शिकायतों को केवल समिति के अध्यक्ष और सदस्य ही देख सकते हैं।शिकायतकर्ता अपना नाम, फोन नंबर और पता बताए बिना भी गुमनाम शिकायत दर्ज कर सकता है। इसके अलावा प्रभावित प्रदर्शनकारियों और पुलिसकर्मियों के लिए अलग-अलग विकल्प और आवेदन प्रारूप उपलब्ध कराए गए हैं। हालांकि, रिपोर्ट में शिकायतों पर बेहद कम प्रतिक्रिया मिलने की बात कही गई है।
दिसंबर के पहले सप्ताह में होगी अगली सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई दिसंबर के पहले सप्ताह में तय की है। अदालत उन याचिकाओं पर विचार कर रही है, जिनमें NEET और अन्य परीक्षाओं के पेपर लीक होने के आरोपों को लेकर जंतर-मंतर, बिहार और देश के दूसरे हिस्सों में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कथित बर्बरता का मामला उठाया गया है।











