
Jyotiraditya Scindia Bows Head: केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया मंगलवार 29 सितंबर को ग्वालियर के महाराजबाड़ा स्थित गोरखी मंदिर पहुंचे। यहां उन्होंने सूफी संत बाबा मंसूर शाह की दरगाह पर श्रद्धा अर्पित की और पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद लिया। इस दौरान उन्होंने देशवासियों के सुख, शांति, समृद्धि और प्रगति की कामना की।
सिंधिया ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी यात्रा की जानकारी साझा करते हुए कहा कि उन्होंने सिंधिया घराने के मार्गदर्शक और आराध्य संत के श्रीचरणों में श्रद्धा अर्पित की और सभी देशवासियों के सुख-शांति, समृद्धि, प्रगति तथा सर्वांगीण विकास के लिए प्रार्थना की।
उर्स के मौके पर गोरखी मंदिर पहुंचना क्यों है खास
बाबा मंसूर शाह के उर्स के दौरान गोरखी मंदिर पहुंचना सिंधिया राजपरिवार की पुरानी परंपरा मानी जाती है। यह परंपरा करीब 300 वर्षों से चली आ रही है। उर्स के अवसर पर राजपरिवार के मुखिया यहां पहुंचकर संत की स्मृति में पूजा-अर्चना करते हैं।
गोरखी मंदिर परिसर में सिंधिया परिवार की इस पुरानी आस्था और परंपरा से जुड़ी कई स्मृतियां भी मौजूद हैं। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया भी मंदिर पहुंचे और संत के दरबार में श्रद्धा व्यक्त की।
महादजी सिंधिया से जुड़ी है आस्था की पुरानी कहानी
बाबा मंसूर शाह के प्रति सिंधिया परिवार की श्रद्धा के पीछे एक पुरानी ऐतिहासिक कथा भी बताई जाती है। सिंधिया राजवंश के संस्थापक महादजी सिंधिया पानीपत के तीसरे युद्ध में घायल हुए थे। उस समय परिवार के लोगों को उनके स्वास्थ्य और सुरक्षित वापसी की चिंता थी।
कहा जाता है कि महादजी सिंधिया की पत्नी और उनकी मां बाबा मंसूर शाह के दरबार में पहुंची थीं। परंपरा के अनुसार, संत ने उन्हें महादजी के सकुशल लौटने का भरोसा दिया था। कुछ समय बाद महादजी सिंधिया के वापस लौटने के बाद परिवार की संत के प्रति आस्था और मजबूत हो गई।
आधी रोटी और पांच पीढ़ियों तक राज करने के आशीर्वाद की मान्यता
बाबा मंसूर शाह और सिंधिया परिवार से जुड़ी एक अन्य मान्यता भी लंबे समय से प्रचलित है। इसके अनुसार महादजी सिंधिया जब संत के दरबार में पहुंचे थे, तब बाबा मंसूर शाह ने उन्हें आधी रोटी दी थी और पांच पीढ़ियों तक राज करने का आशीर्वाद दिया था।
इसी मान्यता और संत की स्मृति से जुड़े उर्स का आयोजन हर वर्ष किया जाता है। उर्स के दौरान सिंधिया परिवार के मुखिया का गोरखी मंदिर पहुंचना इसी पुरानी परंपरा का हिस्सा माना जाता है। ज्योतिरादित्य सिंधिया का मंगलवार को यहां पहुंचना भी उसी परंपरा की निरंतरता के रूप में देखा गया।




















