दुर्ग। साइबर ठग अब सरकारी दस्तावेज और पेंशन से जुड़ी सुविधाओं का झांसा देकर लोगों को निशाना बना रहे हैं। दुर्ग PWD में सहायक अभियंता 61 वर्षीय प्रदीप कुमार सिंघानिया इसी तरह की ठगी का शिकार हो गए। आरोपियों ने पेंशन कार्ड बनवाने का झांसा देकर उनसे निजी बैंकिंग जानकारी हासिल की और अलग-अलग ट्रांजेक्शन के जरिए उनके खाते से 8 लाख 23 हजार रुपये निकाल लिए।

मैसेज से शुरू हुआ ठगी का पूरा खेल

पुलिस में दर्ज शिकायत के अनुसार 23 अगस्त की शाम सिंघानिया के मोबाइल पर पेंशन कार्ड से जुड़ा एक संदेश आया। मैसेज में मौजूद लिंक खोलने के बाद उन्हें एक अनजान नंबर से फोन किया गया।कॉल करने वाले व्यक्ति ने पेंशन कार्ड के लिए पंजीयन कराने की बात कही और इसके बाद वाट्सएप पर एक APK फाइल भेजी। आरोपियों ने इसे बैंक और पेंशन कार्ड सत्यापन की प्रक्रिया से जुड़ी फाइल बताया और उसे खोलकर रजिस्ट्रेशन करने के लिए कहा।

फर्जी बैंक पेज पर मांगी गई संवेदनशील जानकारी

फाइल खोलते ही मोबाइल पर बैंक ऑफ इंडिया की वेबसाइट जैसा दिखाई देने वाला एक पेज खुला। इस पेज पर जन्मतिथि, डेबिट कार्ड नंबर समेत कई निजी जानकारियां मांगी गईं। पीड़ित ने इस प्रक्रिया को वास्तविक समझकर मांगी गई जानकारी दर्ज कर दी।इसके कुछ ही घंटे बाद ठगी का पता चलना शुरू हुआ।

पहले छोटे ट्रांजेक्शन, फिर खाते से बड़ी रकम साफ

रात करीब 9:58 बजे सिंघानिया के मोबाइल पर बैंक ऑफ इंडिया के ऐप से लेनदेन के संदेश आने लगे। पहले खाते से 50 हजार रुपये और फिर 23 हजार रुपये निकलने की जानकारी मिली।संदेह होते ही उन्होंने अपना ATM कार्ड ब्लॉक कराया और बैंक खाते को सुरक्षित कराने के लिए जरूरी कदम उठाए। लेकिन तब तक ठग कई लेनदेन के माध्यम से कुल 8 लाख 23 हजार रुपये निकाल चुके थे।

1930 पर शिकायत के बाद पुलिस तक पहुंचा मामला

ठगी का एहसास होने पर पीड़ित ने तुरंत साइबर हेल्पलाइन 1930 पर सूचना दी। इसके बाद 24 अगस्त को वह बैंक ऑफ इंडिया की इंदिरा मार्केट शाखा पहुंचे और खाते से हुए लेनदेन की जानकारी ली। बैंक स्टेटमेंट की जांच में 8 लाख 23 हजार रुपये की निकासी सामने आई।लिखित शिकायत मिलने के बाद खुर्सीपार पुलिस ने अज्ञात आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। पुलिस ने प्रथम दृष्टया धोखाधड़ी का अपराध मानते हुए BNS की धारा 318(4), 319(2) और IT Act की धारा 66(D) के तहत कार्रवाई की है।मामले की जांच में पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि फर्जी लिंक और APK फाइल के जरिए पीड़ित की बैंकिंग जानकारी किस तरह हासिल की गई और रकम किन खातों में ट्रांसफर हुई।

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