

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दुष्कर्म से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए सहमति की कानूनी अवधारणा पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि यदि कोई बालिग महिला किसी संबंध के परिणामों को समझते हुए स्वेच्छा से उसमें शामिल होती है, तो इसे सहमति माना जाएगा। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने पीड़िता की अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को बरी किए गए फैसले को बरकरार रखा।
डिवीजन बेंच ने की मामले की सुनवाई
मामले की सुनवाई हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें न्यायमूर्ति संजय एस. अग्रवाल और न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास शामिल थे, ने की।
क्या है पूरा मामला
यह मामला सरगुजा जिले के अंबिकापुर स्थित मणिपुर चौकी क्षेत्र का है। शिकायतकर्ता महिला ने आरोप लगाया था कि 15 जून 2018 की रात शौचालय से लौटते समय आरोपी रामेश्वर दास ने उसके साथ मारपीट की, जान से मारने की धमकी दी और दुष्कर्म किया।
फास्ट ट्रैक कोर्ट ने आरोपी को किया था बरी
मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट, सरगुजा में हुई थी। अदालत ने 28 जनवरी को उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया था। इस फैसले को चुनौती देते हुए पीड़िता ने हाईकोर्ट में अपील दायर की।
साक्ष्यों के आधार पर कोर्ट ने सुनाया फैसला
हाईकोर्ट ने पीड़िता के बयान, गवाहों के कथनों और अन्य साक्ष्यों का विस्तृत परीक्षण किया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड से दोनों पक्षों के बीच बातचीत और परिस्थितियां यह संकेत देती हैं कि संबंध आपसी सहमति से बने थे।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का दिया हवाला
अपने निर्णय में हाईकोर्ट ने वर्ष 2013 के Kaini Rajan v. State of Kerala फैसले का उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि सहमति का अर्थ केवल मौन स्वीकृति नहीं है, बल्कि यह परिस्थितियों को समझते हुए लिया गया स्वतंत्र और विचारपूर्ण निर्णय होता है।
मेडिकल रिपोर्ट पर भी किया विचार
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि डॉ. रोजलिन आर. एक्का की मेडिकल रिपोर्ट में दुष्कर्म की स्पष्ट पुष्टि नहीं हुई। साथ ही रिपोर्ट में दर्ज चोटों और कथित घटना के समय के बीच भी स्पष्ट सामंजस्य नहीं पाया गया। इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।











