नई दिल्ली। सदियों से समाज को आध्यात्मिक राह दिखाने वाले और भगवान की सेवा में सर्वस्व अर्पण करने वाले पुजारी, सेवादार और मंदिर कर्मचारी आज स्वयं उपेक्षा के अंधकार में जीने को मजबूर हैं। सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों के इन कर्मचारियों की दयनीय आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए अब सुप्रीम कोर्ट उम्मीद की एक बड़ी किरण बनकर उभरा है।

वकील अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ सुनवाई करने जा रही है।व्यवस्था का दोहरा मापदंड और पुजारियों का दर्द इस याचिका में केंद्र और राज्य सरकारों को एक न्यायिक आयोग या विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश देने की मांग की गई है, जो मंदिर कर्मचारियों के वेतन और अन्य लाभों की समीक्षा कर सके।याचिका के अनुसार, जब सरकार किसी मंदिर का प्रशासनिक और आर्थिक नियंत्रण अपने हाथों में लेती है, तो वहां काम करने वालों के साथ एक नियोक्ता-कर्मचारी का संबंध बनता है। इसके बावजूद, पुजारियों को जीवन स्तर के अनुकूल सम्मानजनक वेतन न देना उनके आजीविका के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21) का सीधा उल्लंघन है।याचिकाकर्ता ने आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु की घटनाओं का हवाला देते हुए कहा कि राज्य सरकारों के नियंत्रण में होने के बावजूद इन सेवादारों को अकुशल श्रमिकों के बराबर भी न्यूनतम वेतन नहीं मिल रहा है। हद तो तब हो गई जब फरवरी 2025 में तमिलनाडु के एक मंदिर में पुजारियों द्वारा आरती की थाली में 'दक्षिणा' लेने पर भी रोक लगा दी गई, जबकि कई पुजारियों का जीवन पूरी तरह इसी पर निर्भर है।महंगाई के इस दौर में यह भेदभाव और शोषण पुजारियों को भुखमरी की कगार पर धकेल रहा है, जिसके खिलाफ अब न्याय के दरवाजे पर दस्तक दी गई है।

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