
पटना। बिहार में नियोजित शिक्षकों के साथ उर्दू और बांग्ला विशेष शिक्षकों की सेवा सुरक्षा का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। हजारों शिक्षकों की नौकरी पर संभावित खतरे को लेकर राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के नेता और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को पत्र लिखा है। उन्होंने राज्य सरकार से प्रभावित शिक्षकों के हितों की रक्षा करने और सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की मांग की है। तेजस्वी ने अपने पत्र में जुलाई 2026 में सुप्रीम कोर्ट के आए एक आदेश का उल्लेख करते हुए आशंका जताई है कि इसका असर वर्ष 2015 के बाद नियुक्त अप्रशिक्षित शिक्षकों और 2015-16 में नियोजित उर्दू-बांग्ला विशेष शिक्षकों की नौकरी पर पड़ सकता है। उन्होंने यह पत्र सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर भी साझा किया है।
17 अक्टूबर को मुख्यमंत्री को लिखा पत्र, शिक्षकों के भविष्य पर जताई चिंता
तेजस्वी यादव ने 17 अक्टूबर 2026 को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को पत्र भेजकर शिक्षकों की सेवा पर पैदा हुई अनिश्चितता का मुद्दा उठाया। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बिहार के कई नियोजित शिक्षकों की नौकरी को लेकर चिंता बढ़ गई है। विशेष रूप से वर्ष 2015 के बाद नियुक्त अप्रशिक्षित शिक्षकों और 2015-16 में बहाल उर्दू तथा बांग्ला विशेष शिक्षकों के सामने असमंजस की स्थिति बन सकती है।
तेजस्वी ने कहा कि इन शिक्षकों ने लंबे समय तक विद्यालयों में अपनी सेवाएं दी हैं। ऐसे में नौकरी समाप्त होने की आशंका से केवल शिक्षक ही नहीं, बल्कि उन पर निर्भर परिवार भी प्रभावित हो सकते हैं। उन्होंने राज्य सरकार से इस मामले को गंभीरता से लेते हुए कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर जल्द कदम उठाने की अपील की है।
वर्ष 2014 में शुरू हुई नियुक्ति प्रक्रिया का दिया हवाला
उर्दू और बांग्ला विशेष शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर तेजस्वी यादव ने एक अहम तर्क सामने रखा है। उनके अनुसार, इन शिक्षकों का नियोजन किसी नई भर्ती प्रक्रिया के तहत नहीं हुआ था, बल्कि इसकी शुरुआत वर्ष 2014 में ही हो गई थी। संबंधित विभागीय आदेशों और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार वर्ष 2015-16 में नियुक्तियां की गई थीं।
तेजस्वी का तर्क है कि जब नियोजन की प्रक्रिया वर्ष 2014 में शुरू हो चुकी थी, तब केवल नियुक्ति की तारीख 31 मार्च 2015 के बाद होने के आधार पर शिक्षकों को सेवा समाप्ति के दायरे में रखना उचित नहीं होगा। उन्होंने सरकार से नियुक्ति से जुड़े दस्तावेजों और वास्तविक परिस्थितियों की समीक्षा करके फैसला लेने की मांग की है।
प्रशिक्षण पूरा करने और सक्षमता परीक्षा पास करने वालों को मिले राहत
तेजस्वी यादव ने पत्र में उन शिक्षकों का मुद्दा भी उठाया है, जिन्होंने नियुक्ति के बाद जरूरी प्रशिक्षण पूरा कर लिया है। उनके मुताबिक, प्रभावित शिक्षकों में ऐसे लोग भी शामिल हैं, जो सक्षमता परीक्षा उत्तीर्ण कर चुके हैं। कुछ शिक्षक वर्तमान में विशिष्ट शिक्षक, प्रधान शिक्षक या विद्यालय अध्यापक के रूप में काम कर रहे हैं।
उन्होंने मांग की है कि डीएलएड प्रशिक्षण पूरा करने वाले, सक्षमता परीक्षा पास करने वाले और बिहार लोक सेवा आयोग की भर्ती प्रक्रिया के तहत नियुक्त शिक्षकों की स्थिति की अलग-अलग समीक्षा की जाए। तेजस्वी के अनुसार, शिक्षकों की योग्यता, प्रशिक्षण और लंबे समय की सेवा को ध्यान में रखते हुए उनकी सेवा सुरक्षा के लिए उचित कानूनी उपाय किए जाने चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की मांग
तेजस्वी यादव ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि राज्य सरकार इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रभावी पैरवी करे और जरूरत के अनुसार पुनर्विचार याचिका दाखिल करे। उनका कहना है कि शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया, प्रशिक्षण, योग्यता और सेवा अवधि से संबंधित सभी जरूरी तथ्यों को अदालत के सामने रखा जाना चाहिए।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के आदेश का वास्तविक दायरा और उसका अलग-अलग शिक्षकों की सेवा पर क्या असर होगा, यह संबंधित आदेश और लागू सेवा नियमों की कानूनी व्याख्या पर निर्भर करेगा। फिलहाल तेजस्वी ने सरकार से प्रभावित शिक्षकों के हित में कानूनी विकल्पों पर तत्काल विचार करने की अपील की है।
नियुक्ति के दस्तावेज गायब होने पर अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग
पत्र में तेजस्वी यादव ने नियोजन से जुड़े अभिलेखों की उपलब्धता और प्रशासनिक लापरवाही का विषय भी उठाया है। उन्होंने कहा कि यदि नियुक्ति प्रक्रिया के दस्तावेजों के रखरखाव में कोई कमी हुई है, तो इसकी जिम्मेदारी संबंधित अधिकारियों की तय की जानी चाहिए।
उनका कहना है कि प्रशासनिक स्तर पर हुई गलतियों का खामियाजा शिक्षकों को नहीं भुगतना चाहिए। जिन मामलों में जरूरी अभिलेख उपलब्ध नहीं हैं, उनकी निष्पक्ष जांच कराई जाए और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही निर्धारित की जाए। तेजस्वी ने सेवा सुरक्षा से जुड़े फैसलों में न्यायसंगत और संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया है।
कारी मोहम्मद शोएब भी उठा चुके हैं उर्दू-बांग्ला शिक्षकों का मुद्दा
उर्दू और बांग्ला विशेष शिक्षकों की सेवा सुरक्षा का मामला इससे पहले भी उठ चुका है। चार अक्टूबर 2026 को बिहार विधान परिषद के सदस्य कारी मोहम्मद शोएब ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को पत्र लिखकर इन शिक्षकों को सेवा समाप्ति की कार्रवाई से सुरक्षा देने की मांग की थी।
उन्होंने प्राथमिक शिक्षा निदेशक के एक अक्टूबर को जारी पत्र का हवाला देते हुए संबंधित शिक्षकों के मामलों की अलग से समीक्षा करने का अनुरोध किया था। शोएब ने भी नियुक्ति प्रक्रिया वर्ष 2014 में शुरू होने और नियोजन वर्ष 2015-16 में किए जाने का तर्क रखा था।
हजारों शिक्षक परिवारों की आजीविका से जुड़ा है मामला
शिक्षकों की सेवा सुरक्षा का सवाल केवल नौकरी तक सीमित नहीं है। इससे उन परिवारों की आर्थिक स्थिरता भी जुड़ी है, जिनकी आजीविका शिक्षकों के वेतन पर निर्भर है। लंबे समय से विद्यालयों में काम कर रहे शिक्षकों के सामने नौकरी जाने की आशंका पैदा होने से परिवारों के भविष्य को लेकर चिंता बढ़ सकती है। इसके साथ ही विद्यालयों में पढ़ाई की निरंतरता पर भी असर पड़ने की आशंका रहती है।
इसी वजह से तेजस्वी यादव ने सरकार से जल्द कार्रवाई करने और प्रभावित शिक्षकों को कानून के दायरे में उचित राहत दिलाने की मांग की है।
अब सरकार के फैसले पर टिकी निगाहें
तेजस्वी यादव के पत्र के बाद बिहार में शिक्षकों की सेवा सुरक्षा का मुद्दा फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गया है। आरजेडी नेता ने पुनर्विचार याचिका दाखिल करने, प्रशिक्षित और परीक्षा उत्तीर्ण शिक्षकों की स्थिति की समीक्षा करने तथा प्रशासनिक कमियों के लिए जवाबदेही तय करने की मांग की है।
फिलहाल उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस पत्र पर राज्य सरकार के किसी अंतिम फैसले या सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल किए जाने की पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में अब यह देखना अहम होगा कि सरकार प्रभावित शिक्षकों के हितों की रक्षा के लिए कौन से कानूनी और प्रशासनिक कदम उठाती है।




















