
नई दिल्ली। लंबे समय से महिलाओं को केंद्र में रखकर चलाई जा रही कल्याणकारी और आर्थिक सहायता योजनाओं के बाद अब राजनीतिक दलों का ध्यान युवा मतदाताओं की ओर तेजी से बढ़ रहा है। वैश्विक स्तर पर युवाओं से जुड़े आंदोलनों और बदलती राजनीतिक सोच ने पार्टियों को इस बड़े वोटर वर्ग की जरूरतों पर नए सिरे से रणनीति बनाने के लिए मजबूर किया है।
आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए युवाओं के लिए रोजगार, कौशल विकास, शिक्षा और स्वरोजगार से जुड़ी योजनाओं को राजनीतिक एजेंडे में प्रमुखता मिलने की संभावना है। भाजपा ने भी चुनावी राज्यों में महिलाओं के साथ युवाओं को सरकारी योजनाओं के केंद्र में रखने की दिशा में काम करने के निर्देश दिए हैं।
कई राज्यों में युवा वोटर निर्णायक भूमिका में
18 से 29 वर्ष की उम्र वाले मतदाताओं की संख्या कई चुनावी राज्यों में काफी बड़ी है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार मणिपुर में यह हिस्सेदारी 22 प्रतिशत, पंजाब में 21 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश में करीब 20 प्रतिशत है। उत्तराखंड में 17.5 प्रतिशत और गोवा में 17 प्रतिशत युवा मतदाता हैं।
इतनी बड़ी हिस्सेदारी किसी भी चुनाव में सत्ता का समीकरण प्रभावित करने की क्षमता रखती है। यही वजह है कि राजनीतिक दल युवाओं की रोजगार और आर्थिक जरूरतों को अपने चुनावी वादों से जोड़ने की तैयारी में जुटे हैं।
रोजगार से लेकर एजुकेशन लोन तक पर फोकस
भाजपा शासित और आगामी चुनाव वाले राज्यों में बेरोजगारी भत्ते तथा दूसरी आर्थिक सहायता योजनाओं को विस्तार देने पर विचार किया जा रहा है। इसके साथ ही उच्च शिक्षा के लिए एजुकेशन लोन की प्रक्रिया आसान बनाने और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं के लिए मुफ्त कोचिंग जैसी सुविधाओं पर भी जोर दिया जा सकता है।
सरकारी नौकरियों को लेकर भी राज्यों को सक्रिय होने के निर्देश दिए गए हैं। इस साल के अंत तक खाली सरकारी पदों को भरने और भर्ती प्रक्रिया को तेजी से पूरा करने की दिशा में अभियान चलाने की तैयारी है।
स्टार्टअप और छात्रवृत्ति भी बन सकते हैं बड़ा चुनावी मुद्दा
युवाओं को साधने की दौड़ में दूसरे राजनीतिक दल भी पीछे नहीं हैं। पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार स्टार्टअप शुरू करने वाले युवाओं को कम ब्याज पर कर्ज देने और ओबीसी वर्ग के विद्यार्थियों की छात्रवृत्ति बढ़ाने जैसे कदमों पर काम कर रही है।
इस तरह रोजगार, सरकारी भर्ती, शिक्षा, स्टार्टअप और आर्थिक सहायता अब केवल युवाओं से जुड़ी नीतियां नहीं रह गई हैं, बल्कि आगामी चुनावों में बड़े राजनीतिक मुद्दे बनने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।



















