लोकतंत्र की आत्मा : अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकार

{आलेख : एच.पी. जोशी}

भारतीय संविधान विश्व के सर्वश्रेष्ठ लोकतांत्रिक संविधानों में से एक माना जाता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल शासन की संरचना निर्धारित नहीं करता, बल्कि प्रत्येक नागरिक की स्वतंत्रता, गरिमा और मौलिक अधिकारों का भी संरक्षण करता है। संविधान के भाग-III में वर्णित मूल अधिकार व्यक्ति और राज्य के मध्य संतुलन स्थापित करते हैं तथा यह सुनिश्चित करते हैं कि राज्य की शक्तियाँ नागरिकों की स्वतंत्रता का अनुचित हनन न कर सकें।

इन्हीं मूल अधिकारों में अनुच्छेद 19(1)(क) प्रत्येक भारतीय नागरिक को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। यह अधिकार केवल बोलने तक सीमित नहीं है, बल्कि लिखने, प्रकाशित करने, विचार व्यक्त करने, सरकार की नीतियों की आलोचना करने, सूचना के आदान-प्रदान, कला, साहित्य, पत्रकारिता तथा अन्य शांतिपूर्ण माध्यमों से अपनी बात रखने की स्वतंत्रता भी प्रदान करता है। किसी भी जीवंत लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके नागरिक कितनी निर्भीकता से अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं।भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर अपने अनेक ऐतिहासिक निर्णयों द्वारा इस अधिकार की संवैधानिक महत्ता को स्पष्ट किया है।पश्चिम बंगाल राज्य बनाम प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स समिति, पश्चिम बंगाल के मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया है कि भारतीय संविधान के भाग तीन द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार नैसर्गिक अधिकार है और उसे किसी संवैधानिक संशोधन या अन्य अधिनियम के तहत समाप्त नहीं किया जा सकता है।भाग 3 में दिए गए अधिकार राज्य की शक्ति के विरोध गारंटी है, न कि सामान्य व्यक्तियों के अवैध कृत्यों के विरुद्ध।

44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 के द्वारा स्पष्ट कर दिया गया है कि "अनुच्छेद 19(1)(क)" में प्रदत्त अधिकारों को अब केवल देश पर युद्ध या बाह्य आक्रमण के कारण देश की सुरक्षा के लिए संकट उत्पन्न होने की दशा में ही निलंबित किया जा सकता है। "सशस्त्र विद्रोह" के आधार पर मूल अधिकारों को निलंबित नहीं किया जा सकता है।

इसी प्रकार ए.आर. अंतुले बनाम आर.एस. नायक के मामले में उच्चतम न्यायालय की सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह अभिनिर्धारित किया है कि न्यायालय ऐसे आदेश या निर्देश नहीं दे सकता है जो नागरिकों के मूल अधिकारों का उल्लंघन करता हो।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(ख) प्रत्येक नागरिक को बिना हथियार के शांतिपूर्वक और निरायुध सम्मेलन करने का अधिकार प्रदान करता है। लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में यह अधिकार नागरिकों को अपने विचार सामूहिक रूप से रखने, जनमत निर्माण करने तथा संविधान सम्मत तरीके से अपनी असहमति व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है। यही कारण है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सम्मेलन का अधिकार लोकतंत्र के दो ऐसे स्तंभ हैं जिन पर उत्तरदायी शासन व्यवस्था आधारित रहती है।

हालाँकि यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि अनुच्छेद 19(1)(क) द्वारा प्रदत्त स्वतंत्रता पूर्णतः निरपेक्ष (Absolute) नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत राज्य भारत की संप्रभुता एवं अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार, न्यायालय की अवमानना, मानहानि तथा अपराध के लिए उकसावे जैसे आधारों पर विधि द्वारा युक्तियुक्त प्रतिबंध लगा सकता है। इसलिए अधिकार और उत्तरदायित्व दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।

लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति केवल चुनावों में नहीं, बल्कि नागरिकों की स्वतंत्र चेतना, तर्कशीलता, असहमति को सम्मान देने की संस्कृति तथा शासन की उत्तरदायित्वपूर्ण समीक्षा में निहित होती है। जहाँ प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता समाप्त हो जाती है, वहाँ लोकतंत्र धीरे-धीरे औपचारिकता बनकर रह जाता है।

मेरा विश्वास है कि जिस प्रकार धर्म केवल उच्च आदर्शों, मानवीय मूल्यों और कर्तव्यों से नहीं वरन् तर्क और विज्ञान की कसौटियों पर खरा उतरने से महान होता है ठीक उसी प्रकार से कोई देश कितना महान है ये इस बात पर निर्भर करता है कि नागरिकों को सरकार के विरुद्ध कितना अधिक कारगर तरीके से बोलने और अभिव्यक्ति रखने की आजादी मिलती है। यदि किसी राष्ट्र में नागरिकों को बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी; शांतिपूर्ण और बिना हथियार सम्मेलन का अधिकार; शिक्षा, स्वास्थ्य और मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति का अधिकार; और गरिमामय जीवन जीने का अधिकार प्राप्त नहीं है तो ये प्रमाणित है कि वो राष्ट्र वास्तव में राजतंत्र है और वहां के नागरिक गुलाम।

भारतीय संविधान का उद्देश्य केवल शासन चलाना नहीं, बल्कि एक ऐसे समाज की स्थापना करना है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति सम्मान, समान अवसर और स्वतंत्र अभिव्यक्ति के साथ जीवन व्यतीत कर सके। संविधान की यही भावना भारत को एक सशक्त, उत्तरदायी और लोकतांत्रिक गणराज्य बनाती है।

"जब तक नागरिक निर्भय होकर सत्य बोल सकते हैं, तब तक लोकतंत्र जीवित रहता है; और जब सत्य बोलना अपराध बन जाए, तब लोकतंत्र का अस्तित्व संकट में पड़ जाता है।"

(एच.पी. जोशी)
लेखक, विचारक, दार्शनिक एवं पुलिस अधिकारी

हुलेश्वर प्रसाद जोशी मानव अधिकारों के जानकार और "मानव अधिकार के अनछुए पहलू" के लेखक हैं।

Leave a reply

Please enter your name here
Please enter your comment!