
बेंगलुरु। कर्नाटक में कमजोर मानसून और पानी की बढ़ती मांग ने जल संकट को गंभीर बना दिया है। राज्य के कई हिस्सों में सूखे के कारण जलाशयों में पानी की उपलब्धता प्रभावित हुई है, जबकि खेती और घरेलू जरूरतों के लिए भूजल पर निर्भरता बढ़ने की आशंका है। विशेषज्ञों ने चेताया है कि यदि बारिश की कमी बनी रही और भूजल का दोहन नियंत्रित नहीं हुआ, तो राज्य में निकासी की दर सुरक्षित मानी जाने वाली 70 प्रतिशत की सीमा पार कर सकती है।
226 तालुक सूखाग्रस्त घोषित
राज्य सरकार ने 14 अक्टूबर 2026 तक 226 तालुकों को सूखाग्रस्त घोषित किया था। इससे पहले इस सूची में 217 तालुक शामिल थे। बाद में नौ और तालुकों को जोड़ा गया। प्रभावित क्षेत्रों में फसलों को हुए नुकसान का आकलन और राहत कार्यों की तैयारी की जा रही है।
राजस्व मंत्री जी. परमेश्वर के अनुसार, सूखे से राज्य को 60 हजार करोड़ रुपये से अधिक का आर्थिक नुकसान होने की आशंका है। राहत सहायता के लिए केंद्र सरकार को विस्तृत ज्ञापन भेजने की प्रक्रिया भी आगे बढ़ाई जा रही है।
भूजल निकासी की 70 प्रतिशत सीमा क्यों अहम?
केंद्रीय भूजल बोर्ड के वर्गीकरण में भूजल निकासी का अनुपात किसी क्षेत्र में पानी की उपलब्धता और उसके इस्तेमाल की स्थिति बताता है। 70 प्रतिशत तक निकासी वाले क्षेत्रों को सुरक्षित श्रेणी में रखा जाता है। 70 से 90 प्रतिशत के बीच के क्षेत्र अर्ध-संकटग्रस्त, 90 से 100 प्रतिशत के बीच संकटग्रस्त और 100 प्रतिशत से अधिक निकासी वाले क्षेत्र अत्यधिक दोहन की श्रेणी में आते हैं।
वर्ष 2025 के आकलन में कर्नाटक की कुल भूजल निकासी दर 66.49 प्रतिशत दर्ज की गई थी। इससे पहले 2024 में यह 68.44 प्रतिशत थी। इसलिए पूरे राज्य में निकासी दर के 70 प्रतिशत से ऊपर पहुंचने की आशंका को फिलहाल संभावित खतरे के रूप में देखना चाहिए, न कि पुष्ट स्थिति के तौर पर।
कम बारिश से भूजल पुनर्भरण प्रभावित
इस वर्ष दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान कर्नाटक में सामान्य से करीब 35 प्रतिशत कम बारिश दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई। वर्षा की कमी से तालाबों, झीलों और जलाशयों में पानी जमा होने की प्रक्रिया प्रभावित हुई। जमीन के भीतर पानी पहुंचने की मात्रा घटने से भूजल का प्राकृतिक पुनर्भरण भी कमजोर पड़ सकता है।
भूजल का स्तर बनाए रखने में बारिश की अहम भूमिका होती है। जब पर्याप्त वर्षा नहीं होती और बोरवेल तथा कुओं से लगातार पानी निकाला जाता है, तो भूमिगत जलभंडारों पर दबाव बढ़ता है।
पांच जिलों में भूजल का अत्यधिक दोहन
वर्ष 2025 के आकलन के मुताबिक, कर्नाटक के कई जिलों में भूजल निकासी की दर 100 प्रतिशत से काफी अधिक थी।
- कोलार में निकासी दर 184.43 प्रतिशत दर्ज की गई।
- बेंगलुरु शहरी में यह 177.28 प्रतिशत रही।
- चिक्कबल्लापुर में दर 165.66 प्रतिशत दर्ज हुई।
- बेंगलुरु ग्रामीण में यह 146.78 प्रतिशत रही।
- चित्रदुर्ग में निकासी दर 133.04 प्रतिशत दर्ज की गई।
इन आंकड़ों का अर्थ है कि संबंधित जिलों में सालाना उपलब्ध भूजल संसाधनों की तुलना में अधिक पानी निकाला जा रहा था। इसके विपरीत उत्तर कन्नड़, उडुपी और दक्षिण कन्नड़ जैसे जिलों में निकासी की दर अपेक्षाकृत कम रही।
जलाशयों में कम भंडारण से बढ़ी चिंता
कर्नाटक के 14 प्रमुख जलाशयों की कुल भंडारण क्षमता करीब 895.65 टीएमसीएफटी बताई गई है। उपलब्ध तुलनात्मक आंकड़ों के अनुसार, 23 जुलाई 2026 को इन जलाशयों में 405.18 टीएमसीएफटी पानी था, जबकि पिछले वर्ष इसी तारीख पर भंडारण 693.48 टीएमसीएफटी दर्ज किया गया था। इस तरह उस समय जल उपलब्धता पिछले साल की तुलना में करीब 42 प्रतिशत कम थी।
अक्टूबर के लिए बताए गए जल भंडारण के कुछ तुलनात्मक आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। इसलिए मौजूदा स्थिति का आकलन करते समय जुलाई के आंकड़ों को अक्टूबर की स्थिति का सीधा प्रतिनिधि नहीं मानना चाहिए।
किसानों पर बढ़ सकता है आर्थिक दबाव
राज्य के कई इलाकों में किसान सिंचाई के लिए बोरवेल और कुओं पर निर्भर हैं। बारिश कम होने और जलाशयों में पर्याप्त पानी न रहने से भूजल का इस्तेमाल बढ़ सकता है। लगातार निकासी के कारण बोरवेल का जलस्तर नीचे जाने पर किसानों को ज्यादा गहराई तक बोरिंग करानी पड़ सकती है। इससे खेती की लागत बढ़ेगी और छोटे किसानों की आर्थिक मुश्किलें भी बढ़ सकती हैं।
सूखे के कारण तुअर, मक्का, कपास, गन्ना, सोयाबीन और मूंग जैसी फसलों को नुकसान पहुंचने की खबरें भी सामने आई हैं।
वर्षा जल संचयन और संरक्षण पर जोर
विशेषज्ञों के मुताबिक, संकट को कम करने के लिए वर्षा जल संचयन, तालाबों का संरक्षण, चेक डैम का निर्माण और जलग्रहण क्षेत्रों का विकास जरूरी है। खेतों में पानी का कुशल इस्तेमाल और शहरी इलाकों में वर्षा जल संचयन व्यवस्था को प्रभावी बनाना भी भूजल पुनर्भरण में मदद कर सकता है।
इसके साथ ही भूजल निकासी की निगरानी और पानी के विवेकपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देना आवश्यक है। केवल बारिश पर निर्भर रहने के बजाय दीर्घकालिक जल प्रबंधन की व्यवस्था बनाना भी महत्वपूर्ण है।
आने वाले महीनों में जल प्रबंधन की परीक्षा
कर्नाटक के सामने अब किसानों को राहत देने, पेयजल की उपलब्धता बनाए रखने और भूजल संसाधनों को सुरक्षित रखने की दोहरी चुनौती है। राज्य के 226 तालुकों में सूखे की स्थिति और कई जिलों में भूजल के अत्यधिक दोहन के आंकड़े चिंता बढ़ाते हैं।
यदि पर्याप्त बारिश नहीं हुई और जल संरक्षण के उपाय प्रभावी ढंग से लागू नहीं किए गए, तो कृषि, घरेलू जल आपूर्ति और औद्योगिक गतिविधियों पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में भूजल के इस्तेमाल को नियंत्रित करना और उपलब्ध पानी का बेहतर प्रबंधन करना राज्य के लिए अहम होगा।



















