विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में गिरती रैंकिंग और बढ़ते कड़े प्रतिबंध: क्या भारत के चौथे स्तंभ पर छंटेंगे खतरे के बादल?

पत्रकार बचेगा तो लोकतंत्र बचेगा।" यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि किसी भी जीवंत लोकतंत्र की आत्मा है।
संविधान की प्रस्तावना में निहित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जब-जब खतरे में पड़ती है, तब-तब लोकतंत्र का ढांचा कमजोर होने लगता है। 'रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' (RSF) द्वारा जारी वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2026 में 180 देशों के बीच भारत का 157वें स्थान पर खिसक जाना कोई मामूली बात नहीं है।

यह आंकड़ा इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि देश में निष्पक्ष पत्रकारिता और स्वतंत्र अभिव्यक्ति के रास्ते दिन-ब-दिन कठिन होते जा रहे हैं।

डेटा का अभाव और स्वतंत्र निगरानी संस्थाओं की चिंताएं

विडंबना यह है कि देश में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के पास 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के उल्लंघन' से जुड़ा कोई आधिकारिक श्रेणीबद्ध आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
हालांकि, 'फ्री स्पीच कलेक्टिव' (FSC) और 'थ्रैट ट्रैकर' जैसी स्वतंत्र संस्थाओं के आंकड़े एक चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं। बीते एक दशक में सेंसरशिप, पत्रकारों पर हमलों और कानूनी शिकंजों में बेतहाशा बढ़ोतरी देखी गई है।

1. डिजिटल स्पेस पर कसता शिकंजा

डिजिटल युग में जहां इंटरनेट को सूचनाओं के आदान-प्रदान का सबसे सशक्त माध्यम माना गया था, वहीं अब यह डिजिटल सेंसरशिप का नया अड्डा बन चुका है।सोशल मीडिया पर पाबंदी: सिर्फ वर्ष 2025 में X (पूर्व में ट्विटर) पर 29,000 से अधिक कंटेंट हटाने या अकाउंट ब्लॉक करने के अनुरोध किए गए।मास सेंसरशिप: हाल के वर्षों में इंटरनेट शटडाउन, वेबसाइट ब्लॉकिंग और यूट्यूब/सोशल मीडिया अकाउंट्स को ब्लॉक करने के 15,000 से अधिक मामले दर्ज किए जा चुके हैं।

2. सच बोलने की भारी कीमत: हमले और हत्याएं

पर्यावरण, स्थानीय भ्रष्टाचार और राजनीतिक घोटालों पर निर्भीक रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों के लिए स्थितियां बेहद खतरनाक हो चुकी हैं।जान गंवाने वाले पत्रकार: अंतरराष्ट्रीय मीडिया वॉचडॉग्स (RSF और CPJ) के अनुसार, बीते 12 वर्षों में लगभग 28 से अधिक पत्रकारों की उनकी रिपोर्टिंग के कारण हत्या कर दी गई।हालांकि अलग सोर्स और प्रिंट, इलेक्ट्रिंक मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म में छपी और चली खबरों के अनुसार यह संख्य भयावह है बीते 12 वर्षों में लगभग 84 पत्रकारों से अधिक की हत्या कर दी गई।वर्ष 2004 से 2014 के बीच लगभग 22 पत्रकारों की हत्या हुई .. क्या वजह है इस सरकार में लगभग चार गुना पत्रकारों की हत्या हो चुकी है ।

शारीरिक हमले: 'ठाकुर फाउंडेशन' की रिपोर्ट के मुताबिक देश भर में पत्रकारों, स्वतंत्र यूट्यूबर्स और सामाजिक कार्यकर्ताओं पर हमले, धमकी और उत्पीड़न के 200 से अधिक गंभीर मामले सामने आए हैं।

3. कानूनी कार्रवाई का हथियार (Lawfare)

पत्रकारों और असहमति जताने वाले नागरिकों को डराने के लिए आपराधिक कानूनों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है।
UAPA व देशद्रोह: पिछले दशक में कम से कम 15 प्रमुख पत्रकारों और दर्जनों कार्यकर्ताओं पर आतंकवाद विरोधी कड़े कानूनों (UAPA) के तहत मामले दर्ज कर उन्हें हिरासत में लिया गया।

आम नागरिकों की गिरफ्तारी: व्यक्तिगत विचारों या सोशल मीडिया पोस्ट के लिए आम नागरिकों पर FIR दर्ज होने की घटनाएं आम हो चुकी हैं (FSC ने एक ही वर्ष में 117 से अधिक गिरफ्तारियां ट्रैक कीं)।

मानहानि मामले: कॉर्पोरेट और राजनीतिक आलोचना करने वाले खोजी पत्रकारों को निशाना बनाने के लिए आपराधिक मानहानि का सहारा लिया जा रहा है।

संवैधानिक अधिकार बनाम धरातल की सच्चाई

भारत का अनुच्छेद 19(1)(a) देश के हर नागरिक को बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी देता है। यद्यपि अनुच्छेद 19(2) के तहत देश की सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए "तार्किक प्रतिबंध" (Reasonable Restrictions) लगाए जा सकते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या इन प्रतिबंधों का इस्तेमाल असहमति की आवाज को दबाने के लिए किया जा सकता है?

हाल के वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने कई बार स्पष्ट किया है कि "सरकार या व्यवस्था की आलोचना करना अथवा कविता लिखना देशद्रोह या अपराध नहीं है।" एक मजबूत और जीवंत लोकतंत्र में वैचारिक भिन्नता और आलोचना का सम्मान होना ही चाहिए।

निष्कर्ष

पत्रकारिता कोई पेशा मात्र नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल पूछने और जनता तक सच पहुंचाने का संवैधानिक दायित्व है। यदि पत्रकारों पर मुकदमे थोपे जाएंगे, डिजिटल सेंसरशिप के जरिए उनकी आवाज बंद की जाएगी और हिंसा का डर दिखाया जाएगा, तो अंततः इसका नुकसान आम जनता और भारत की लोकतांत्रिक साख को होगा।समय आ गया है कि सरकारें, न्यायपालिका और समाज मिलकर इस बात को समझें कि स्वतंत्र प्रेस के बिना संविधान का अस्तित्व अधूरा है। लोकतंत्र को बचाने के लिए अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा करना अब किसी विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि अनिवार्य शर्त के रूप में देखा जाना चाहिए।

लेखक :- राकेश प्रताप सिंह परिहार, राष्ट्रीय महासचिव (अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति) पत्रकार सुरक्षा कानून लागू करने संघर्षरत।

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