चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा बोले केवल आशंका या आरोपों के आधार पर नहीं बदला जा सकता मुकदमे का न्यायालय, निष्पक्ष सुनवाई न मिलने के ठोस प्रमाण जरूरी

बिलासपुर: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने बहुचर्चित हत्या एवं एससी-एसटी अत्याचार अधिनियम से जुड़े मामले में पूर्व एसडीएम करुण डहरिया को बड़ा झटका देते हुए उनके खिलाफ चल रहे आपराधिक मुकदमे को दूसरे जिले में स्थानांतरित करने की मांग खारिज कर दी। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि किसी आपराधिक मुकदमे के स्थानांतरण के लिए केवल आशंका, असंतोष अथवा पीठासीन अधिकारी के विरुद्ध लगाए गए आरोप पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए यह साबित होना आवश्यक है कि अभियुक्त को निष्पक्ष न्याय मिलने की वास्तविक और उचित संभावना प्रभावित हो रही है।उच्च न्यायालय ने यह आदेश टीपी (सीआर) क्रमांक 10/2026, करुण डहरिया बनाम छत्तीसगढ़ राज्य एवं अन्य में 28 जुलाई 2026 को पारित किया।

हत्या के बहुचर्चित प्रकरण से जुड़ा है मामला...

यह मामला थाना करौंधा में दर्ज अपराध क्रमांक 03/2026 से संबंधित है। अभियोजन के अनुसार 15 फरवरी 2026 की रात अवैध बॉक्साइट खनन एवं परिवहन को लेकर हुए विवाद में राम उर्फ रामनरेश पर हमला किया गया, जिसकी उपचार के दौरान मृत्यु हो गई। मामले में तत्कालीन एसडीएम करुण डहरिया सहित चार लोगों के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत अपराध दर्ज किया गया। वर्तमान में इस प्रकरण की सुनवाई विशेष सत्र परीक्षण क्रमांक 13/2026 के रूप में जिला एवं सत्र न्यायालय, रामानुजगंज में चल रही है।

याचिका में लगाए थे गंभीर आरोप...

करुण डहरिया ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 की धारा 447 के तहत दायर याचिका में आरोप लगाया था कि उन्हें निष्पक्ष सुनवाई नहीं मिल रही है। याचिका में कहा गया कि प्रारंभ में अधूरी चार्जशीट उपलब्ध कराई गई, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की प्रतियां समय पर नहीं दी गईं, बचाव पक्ष के आवेदनों पर समुचित विचार नहीं किया गया तथा आरोप तय करने की प्रक्रिया में पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया।

याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि सुनवाई के दौरान पीठासीन अधिकारी द्वारा की गई कुछ मौखिक टिप्पणियों से ऐसा प्रतीत हुआ कि उन्होंने मामले के संबंध में पहले से राय बना ली है। इसी आधार पर मुकदमे को बलरामपुर-रामानुजगंज जिले से बाहर किसी अन्य सक्षम न्यायालय में स्थानांतरित करने की मांग की गई।

राज्य ने कहा— मुकदमे में देरी की कोशिश...

राज्य शासन की ओर से प्रस्तुत जवाब में इन आरोपों का खंडन किया गया। राज्य ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई तथ्य नहीं है जिससे न्यायालय के पक्षपातपूर्ण रवैये की पुष्टि होती हो। सभी प्रक्रियाएं कानून के अनुरूप अपनाई गई हैं और स्थानांतरण याचिका केवल मुकदमे की सुनवाई में विलंब करने के उद्देश्य से दायर की गई है।

पीठासीन अधिकारी ने भी दिया स्पष्टीकरण...

उच्च न्यायालय के निर्देश पर संबंधित पीठासीन अधिकारी ने लिखित टिप्पणी प्रस्तुत करते हुए कहा कि अभियुक्त को सभी आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराए गए थे तथा प्रत्येक चरण में पर्याप्त अवसर दिया गया। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि गवाहों की सुरक्षा का निर्देश केवल इसलिए दिया गया था ताकि गरीब एवं आदिवासी गवाह बिना किसी दबाव या भय के न्यायालय में साक्ष्य प्रस्तुत कर सकें। उन्होंने आरोपों को निराधार बताया तथा कहा कि सभी आदेश न्यायिक विवेक और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर पारित किए गए हैं।

हाईकोर्ट ने क्या कहा...

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा ने आदेश में कहा कि किसी आपराधिक मुकदमे का स्थानांतरण न्यायालय की असाधारण शक्ति है, जिसका प्रयोग केवल अत्यंत विशेष परिस्थितियों में किया जा सकता है। न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ता अपने आरोपों के समर्थन में कोई स्वतंत्र अथवा वस्तुनिष्ठ साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि गवाहों को सुरक्षा उपलब्ध कराना न्यायालय का वैधानिक दायित्व है और इसे पक्षपात का प्रमाण नहीं माना जा सकता। कलेक्टर की प्रशासनिक जांच रिपोर्ट भी पुलिस की वैधानिक विवेचना का स्थान नहीं ले सकती।

'फोरम शॉपिंग' को नहीं दिया जा सकता बढ़ावा...

निर्णय में उच्च न्यायालय ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि केवल आरोपों और आशंकाओं के आधार पर मुकदमों का स्थानांतरण किया जाने लगे, तो इससे अधीनस्थ न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित होगी तथा न्यायिक व्यवस्था में "फोरम शॉपिंग" जैसी प्रवृत्तियों को बढ़ावा मिलेगा। इसलिए स्थानांतरण का आदेश केवल ठोस और विश्वसनीय आधारों पर ही पारित किया जा सकता है।

याचिका खारिज, निचली अदालत को दिए निर्देश...

उच्च न्यायालय ने अंततः स्थानांतरण याचिका खारिज करते हुए विश्वास व्यक्त किया कि संबंधित विशेष न्यायालय निष्पक्षता, गरिमा और कानून के अनुरूप मुकदमे की सुनवाई आगे भी जारी रखेगा। साथ ही आदेश की प्रति संबंधित न्यायालय को भेजने के निर्देश भी दिए गए।

फैसला क्यों महत्वपूर्ण...

यह निर्णय स्पष्ट करता है कि बीएनएसएस की धारा 447 के अंतर्गत मुकदमे के स्थानांतरण के लिए केवल आरोप या आशंका पर्याप्त नहीं होंगे। न्यायालय बदलने की मांग करने वाले पक्ष को यह वस्तुनिष्ठ रूप से सिद्ध करना होगा कि निष्पक्ष सुनवाई की वास्तविक संभावना प्रभावित हो रही है। विशेषज्ञों के अनुसार यह निर्णय भविष्य में स्थानांतरण याचिकाओं के निपटारे के लिए एक महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टांत माना जाएगा।

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