
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कक्षा आठ की एनसीईआरटी सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से जुड़े आपत्तिजनक अध्याय के मामले में स्वत: संज्ञान लेकर शुरू की गई कार्यवाही बंद कर दी।
केंद्र ने अदालत को बताया कि विवादित अध्याय को विशेषज्ञ पैनल के सुझावों के आधार पर बदल दिया गया है और संशोधित अध्याय वाली पाठ्यपुस्तकें अब चलन में हैं।प्रधान न्यायाधीश (सीजेआइ) सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची और वी. मोहना की पीठ ने केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलीलें सुनने के बाद मामले को बंद कर दिया।सुनवाई के दौरान अदालत ने 22 मई के अपने आदेश में पाठ्यक्रम को समितियों के सामने नहीं रखे जाने से संबंधित टिप्पणी को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की।कोर्ट ने कहा कि आदेश में दर्ज यह बात कि पाठ्यक्रम को सभी स्तरों पर समितियों के सामने नहीं रखा गया था और इसलिए इसे सामूहिक निर्णय नहीं माना जा सकता, अदालत की टिप्पणी या निष्कर्ष नहीं था। यह सिर्फ सॉलिसिटर जनरल की ओर से दी गई दलील का रिकॉर्ड था।
मेहता ने भी स्पष्ट किया कि उन्होंने शिक्षाविदों पर यह आरोप नहीं लगाया था कि उन्होंने पाठ्यक्रम को समितियों के सामने पेश नहीं किया। उन्होंने कहा कि उनका कहना सिर्फ इतना था कि पाठ्यक्रम समिति के समक्ष नहीं रखा गया था और इसलिए इसे सामूहिक निर्णय नहीं कहा जा सकता।
शिक्षाविदों में से एक की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने कहा कि यदि अदालत के आदेश में दर्ज इन बातों को न्यायिक निष्कर्ष माना गया तो इससे उनके मुवक्किल को नुकसान हो सकता है। इसके बाद सॉलिसिटर जनरल ने अपनी दलील की स्थिति स्पष्ट की।शीर्ष अदालत ने इससे पहले 11 मार्च के अपने आदेश में केंद्र, राज्यों और अन्य पक्षों को न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से जुड़े विवादित अध्याय को लेकर तीन शिक्षाविदों से दूरी बनाने का निर्देश दिया था। बाद में तीनों शिक्षाविदों की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण पर विचार करने के बाद अदालत ने अपने आदेश में बदलाव किया था।
अदालत ने 11 मार्च के आदेश में की गई कुछ टिप्पणियों को वापस लेते हुए केंद्र, राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों, सार्वजनिक विश्वविद्यालयों और केंद्र या राज्य सरकारों से वित्त पोषित संस्थानों को इस मुद्दे पर स्वतंत्र निर्णय लेने की छूट दी थी। उन्हें कहा गया था कि वे अदालत के पहले के आदेश में की गई टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना फैसला लें।
शीर्ष अदालत ने उन टिप्पणियों को भी हटा दिया था, जिनमें कहा गया था कि प्रोफेसर मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्ना कुमार ने कक्षा आठ के छात्रों के सामने भारतीय न्यायपालिका की नकारात्मक छवि पेश करने के लिए तथ्यों को जानबूझकर और सोच-समझकर गलत तरीके से पेश किया।




















