“साहित्य केवल मनोरंजन की वस्तु नहीं, बल्कि समाज की चेतना को जगाने का सबसे सशक्त माध्यम है।” इस विचार को अपने जीवन का मूलमंत्र बनाने वाले मुंशी प्रेमचंद भारतीय साहित्य के ऐसे प्रकाशपुंज हैं, जिनकी रचनात्मक आभा ने हिंदी और उर्दू कथा-साहित्य को नई दृष्टि, नई संवेदना और नया धरातल प्रदान किया। एक साधारण शिक्षक से ‘उपन्यास सम्राट’ और ‘कहानी सम्राट’ तक की उनकी यात्रा केवल एक साहित्यकार की निजी उपलब्धि नहीं, बल्कि पराधीन भारत के सामाजिक जीवन, संघर्षों, विसंगतियों और आकांक्षाओं की जीवंत गाथा है। प्रेमचंद ने साहित्य को कल्पना के मनोरम संसार तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे समाज की धड़कनों को सुनने, उसकी पीड़ा को स्वर देने और उसके अंतर्विरोधों पर प्रश्न उठाने का माध्यम बनाया। उनकी कलम राजमहलों की चमक से अधिक गांव की धूल, खेतों की मेड़, किसान के पसीने, मजदूर की थकान, स्त्री की विवशता और वंचित मनुष्य की मौन वेदना से जुड़ी रही।

समय का दस्तावेज बना प्रेमचंद का साहित्य

उनका साहित्य उस भारत का जीवंत दस्तावेज है, जो औपनिवेशिक शासन, आर्थिक अभाव, सामंती शोषण, सामाजिक विषमता और रूढ़ियों के बीच अपने अस्तित्व और सम्मान के लिए संघर्ष कर रहा था। 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के निकट लमही गांव में जन्मे धनपत राय श्रीवास्तव ने जीवन की कठिन पाठशाला से गुजरते हुए ‘प्रेमचंद’ के रूप में साहित्य जगत में अमिट पहचान बनाई। अभावों के बीच शिक्षा, अध्यापन, सरकारी सेवा, राष्ट्रीय चेतना और अंततः साहित्य को जीवन-धर्म बनाना उनकी कर्म यात्रा के प्रमुख पड़ाव रहे। 8 अक्टूबर 1936 को उनका भौतिक जीवन भले ही थम गया, लेकिन उनकी कलम की लौ आज भी प्रज्वलित है। उनके पात्र समय की सीमाओं से परे जाकर आज भी हमारे समाज में सांस लेते हैं। यही प्रेमचंद की कालजयी शक्ति है। उन्होंने अपने समय को लिखा, लेकिन आने वाली पीढ़ियों के लिए भी समाज का आईना छोड़ गए।

अभावों की पाठशाला से साहित्य के शिखर तक

प्रेमचंद का बचपन संघर्षों की ऐसी गाथा रहा, जिसने उनके व्यक्तित्व और साहित्यिक चेतना की बुनियाद तैयार की। साधारण आर्थिक परिस्थितियों और पारिवारिक कठिनाइयों ने उन्हें बहुत कम उम्र में ही जीवन के कठोर यथार्थ से परिचित करा दिया था। बाल्यावस्था में ही मां का निधन और उसके बाद पारिवारिक जिम्मेदारियों का बोझ उनके कोमल और संवेदनशील मन पर गहरी छाप छोड़ गया। अभाव अक्सर मनुष्य से बहुत कुछ छीन लेते हैं, लेकिन जब यही अभाव किसी संवेदनशील आत्मा से टकराते हैं, तो वे अनुभवों की ऐसी अमूल्य पूंजी भी छोड़ जाते हैं, जो जीवन भर उसका संबल बनी रहती है। प्रेमचंद के जीवन में भी अभाव केवल पीड़ा बनकर नहीं आया, बल्कि उसने उन्हें समाज और मनुष्य को भीतर तक समझने की दृष्टि दी। उन्होंने गरीबी को दूर खड़े होकर नहीं देखा था; उसे उन्होंने अपने जीवन में निकट से जिया और महसूस किया था। यही कारण है कि उनके साहित्य में गरीब व्यक्ति महज ‘गरीब’ बनकर उपस्थित नहीं होता, बल्कि उसके भीतर सपने देखने वाला, स्वाभिमान से जीने वाला, परिस्थितियों से जूझने वाला और नैतिक द्वंद्वों से गुजरने वाला एक संपूर्ण मनुष्य दिखाई देता है। विपरीत परिस्थितियों के बावजूद शिक्षा के प्रति उनकी जिजीविषा कभी मंद नहीं पड़ी। सीमित साधनों के बीच भी उन्होंने अध्ययन जारी रखा और उर्दू-फारसी के साथ हिंदी तथा अंग्रेजी साहित्य का गंभीर परिचय प्राप्त किया। स्वाध्याय उनके जीवन का आधार और आत्म निर्माण का महत्वपूर्ण साधन बना। पुस्तकों और जीवनानुभवों से अर्जित यह ज्ञान आगे चलकर उनकी रचनात्मक दृष्टि का विस्तार करता गया। इसी अध्ययनशीलता, संघर्षशीलता और जीवन के विविध रंगों को निकट से देखने की क्षमता ने प्रेमचंद के साहित्य को व्यापक मानवीय दृष्टि प्रदान की। उनकी कलम में इसलिए केवल कल्पना की उड़ान नहीं, बल्कि जीवन की धूल, पसीना, पीड़ा, संघर्ष और मनुष्य की अदम्य जिजीविषा की सजीव धड़कन सुनाई देती है।

‘नवाब राय’ से ‘प्रेमचंद’ बनने की यात्रा

प्रेमचंद की साहित्यिक यात्रा ‘नवाब राय’ नाम से आरंभ हुई। उनकी आरंभिक रचनाओं में देशभक्ति और राष्ट्रीय चेतना का स्वर स्पष्ट दिखाई देता है। उनकी पुस्तक सोज़-ए-वतन ब्रिटिश शासन की नजर में आई और उनके विरुद्ध कार्रवाई हुई। इसके बाद उन्होंने ‘प्रेमचंद’ नाम अपनाया। यह परिवर्तन केवल नाम का परिवर्तन नहीं था। यह उस लेखक की पहचान का विस्तार था, जिसने अपनी कलम को सत्ता के भय से मुक्त रखने का निर्णय लिया था। उनके लिए साहित्य निजी प्रसिद्धि का साधन नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी का माध्यम था। प्रेमचंद के साहित्य में राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक स्वतंत्रता की आकांक्षा तक सीमित नहीं रहा। उनके लिए राष्ट्र का अर्थ उन करोड़ों लोगों का जीवन था, जिनके श्रम पर देश की सामाजिक और आर्थिक संरचना खड़ी थी। इसलिए किसान, मजदूर, स्त्री और वंचित वर्ग उनके राष्ट्र की वास्तविक तस्वीर का हिस्सा बने।

शिक्षक से साहित्यकार तक

प्रेमचंद ने अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अध्यापन और सरकारी सेवा में बिताया। शिक्षक के रूप में काम करने के दौरान उन्हें समाज की विभिन्न परतों को करीब से समझने का अवसर मिला। नौकरी ने उन्हें प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली दिखाई, जबकि समाज के सामान्य लोगों से उनका संपर्क उनके अनुभव संसार को लगातार विस्तृत करता रहा। 1919 के आसपास गांधी के राष्ट्रीय आंदोलन और असहयोग की विचारधारा का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़कर साहित्य और सामाजिक चेतना के मार्ग को अधिक स्पष्ट रूप से अपनाया। यह निर्णय उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। आर्थिक सुरक्षा के सामने विचार और आत्मसम्मान को चुनना आसान नहीं था, लेकिन प्रेमचंद की दृष्टि में साहित्यकार का दायित्व जीवन की सुविधाओं से बड़ा था।

साहित्य को समाज का दर्पण बनाने की दृष्टि

प्रेमचंद ने साहित्य को जीवन से अलग करके नहीं देखा। उनके लिए साहित्य वही सार्थक है जिसमें मनुष्य का जीवन दिखाई दे। उन्होंने समाज के उन हिस्सों को कथा के केंद्र में रखा, जिन्हें लंबे समय तक साहित्य के हाशिये पर रखा गया था। उनके उपन्यासों और कहानियों में गांव है, शहर है, किसान है, मजदूर है, कर्मचारी है, व्यापारी है, स्त्री है, बच्चा है, जमींदार है और वह सामान्य मनुष्य भी है जो व्यवस्था के बड़े पहियों के नीचे पिसते हुए अपने अस्तित्व को बचाने की कोशिश करता है। प्रेमचंद की विशेषता यह थी कि उन्होंने सामाजिक समस्याओं को केवल भाषण की तरह प्रस्तुत नहीं किया। उन्होंने उन्हें पात्रों के जीवन में उतारा। पाठक जब होरी, धनिया, निर्मला, हामिद, घीसू या माधव से मिलता है तो वह किसी सामाजिक सिद्धांत को नहीं, बल्कि एक जीवित मनुष्य को देखता है। यही उनकी कथा-कला की सबसे बड़ी शक्ति है।

किसान जीवन की पीड़ा और ‘गोदान’

भारतीय ग्रामीण जीवन प्रेमचंद के साहित्य का एक महत्वपूर्ण आधार है। किसान उनके लिए केवल खेत में काम करने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था और सभ्यता की आधारशिला था। फिर भी वही किसान कर्ज, जमींदारी, सामाजिक दबाव और आर्थिक असुरक्षा से घिरा हुआ दिखाई देता है। गोदान में होरी का चरित्र इस त्रासदी का विराट प्रतीक बन जाता है। होरी के सपने बहुत बड़े नहीं हैं। वह चाहता है कि उसके घर में एक गाय हो, परिवार सुरक्षित रहे और समाज में उसकी प्रतिष्ठा बनी रहे। लेकिन छोटी-सी इच्छाओं वाला यह आदमी कर्ज, शोषण और सामाजिक व्यवस्था के ऐसे जाल में उलझता चला जाता है, जिससे निकलना उसके लिए संभव नहीं होता। गोदान केवल एक किसान की कहानी नहीं है। यह उस सामाजिक संरचना का चित्र है जिसमें श्रम करने वाला व्यक्ति अपने श्रम के फल से वंचित रहता है। उपन्यास में गांव के साथ शहर का जीवन भी है। इस तरह प्रेमचंद ग्रामीण और शहरी भारत के बीच मौजूद आर्थिक और सामाजिक संबंधों को भी सामने लाते हैं।

स्त्री जीवन की पीड़ा और संघर्ष

प्रेमचंद के साहित्य में स्त्री केवल घर की चारदीवारी में सीमित पात्र नहीं है। वह सामाजिक व्यवस्था की विसंगतियों को अपने जीवन में झेलने वाली संवेदनशील मनुष्य है। सेवासदन में स्त्री जीवन और सामाजिक नैतिकता के प्रश्न उठते हैं, जबकि निर्मला दहेज और अनमेल विवाह जैसी सामाजिक कुरीतियों की त्रासदी को सामने लाता है। प्रेमचंद ने स्त्री की पीड़ा को केवल करुणा पैदा करने के लिए नहीं लिखा, बल्कि उसके पीछे काम करने वाली सामाजिक व्यवस्था पर प्रश्न उठाया। उनकी स्त्री पात्रों में सहनशीलता के साथ आत्मसम्मान भी है। वे परिवार, समाज और परिस्थितियों के बीच संघर्ष करती हैं। इस दृष्टि से प्रेमचंद का साहित्य अपने समय के सामाजिक वातावरण में स्त्री प्रश्न को गंभीरता से सामने रखने वाला साहित्य है।

वंचित समाज की आवाज

प्रेमचंद की साहित्यिक दृष्टि की व्यापकता इस बात से भी समझी जा सकती है कि उन्होंने जातिगत भेदभाव और सामाजिक विषमता को अपनी रचनाओं में महत्वपूर्ण स्थान दिया। सद्गति और ठाकुर का कुआं जैसी कहानियां सामाजिक विभाजन की कठोर वास्तविकता को उजागर करती हैं। इन रचनाओं में वंचित मनुष्य केवल सहानुभूति का पात्र नहीं है। उसकी स्थिति के पीछे मौजूद सामाजिक शक्ति-संबंधों को भी देखा गया है। प्रेमचंद यह प्रश्न उठाते हैं कि जिस समाज में मनुष्य की गरिमा जन्म के आधार पर तय की जाती है, वहां वास्तविक न्याय कैसे संभव होगा? उनका साहित्य इसीलिए आज भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सामाजिक समानता का प्रश्न समय बदलने के बावजूद समाप्त नहीं हुआ है।

‘कफन’ : गरीबी की भयावह परिणति

प्रेमचंद की कहानी कफन उनके यथार्थवाद की तीक्ष्णता का उदाहरण है। घीसू और माधव के माध्यम से उन्होंने गरीबी, भूख और सामाजिक व्यवस्था के ऐसे रूप को सामने रखा है जहां मनुष्य की संवेदनाएं भी अभावों के दबाव में विकृत हो जाती हैं। यह कहानी पाठक को आसान निष्कर्ष नहीं देती। वह पूछती है कि क्या घीसू और माधव की संवेदनहीनता केवल उनकी व्यक्तिगत कमजोरी है या उस सामाजिक व्यवस्था का परिणाम भी है जिसने पीढ़ियों से उन्हें अभाव और अपमान में जीने के लिए मजबूर किया? यही प्रश्नवाचकता प्रेमचंद की रचना को स्थायी बनाती है। वे पाठक को केवल कहानी सुनाकर विदा नहीं करते, बल्कि उसके भीतर एक बेचैनी छोड़ जाते हैं।

प्रेमचंद का आदर्शोन्मुख यथार्थवाद

प्रेमचंद के साहित्य को केवल यथार्थवाद कहना पर्याप्त नहीं होगा। उनके यथार्थ के भीतर परिवर्तन की आकांक्षा भी मौजूद है। वे समाज की कुरूपताओं को इसलिए दिखाते हैं ताकि मनुष्य उन्हें पहचान सके और बेहतर समाज की दिशा में आगे बढ़ सके। उनकी दृष्टि में साहित्य जीवन से भागने का साधन नहीं है। वह जीवन की कठिनाइयों के बीच मनुष्य के भीतर नैतिकता, न्याय और मानवीयता की संभावना तलाशता है। यही कारण है कि उनके साहित्य में करुणा निराशा में बदलने के बजाय सामाजिक चेतना को जन्म देती है। उनका यथार्थ जीवन की मिट्टी से जुड़ा है, लेकिन उसकी दृष्टि भविष्य की ओर देखती है।

कहानीकार प्रेमचंद की अद्भुत दुनिया

प्रेमचंद ने हिंदी कहानी को सामाजिक यथार्थ की मजबूत जमीन दी। ईदगाह में बालमन और त्याग की मार्मिकता है। हामिद का चरित्र यह बताता है कि गरीबी मनुष्य की संवेदना को हमेशा छोटा नहीं करती; कभी-कभी वह प्रेम को और गहरा बना देती है। पूस की रात में किसान की विवशता और प्रकृति के सामने उसकी असहायता है। पंच परमेश्वर में न्याय और मित्रता के बीच संघर्ष दिखाई देता है। नमक का दारोगा ईमानदारी और भ्रष्ट व्यवस्था के द्वंद्व को सामने लाती है। दो बैलों की कथा में पशुओं के माध्यम से मनुष्य की स्वतंत्रता और आत्मसम्मान की भावना को अभिव्यक्ति मिलती है। इन कहानियों की खूबी यह है कि इनमें बड़े सामाजिक प्रश्न छोटे-छोटे जीवन प्रसंगों के माध्यम से सामने आते हैं।

भाषा : जनजीवन की सहज धड़कन

प्रेमचंद की भाषा उनकी लोकप्रियता का एक बड़ा कारण है। उन्होंने साहित्य को कठिन शब्दों और कृत्रिम अलंकरणों से बोझिल नहीं बनाया। उनकी भाषा सरल, सहज, प्रवाहपूर्ण और जनसामान्य के निकट है। हिंदी और उर्दू के शब्दों का स्वाभाविक मेल उनकी भाषा को भारतीय समाज की साझा सांस्कृतिक जमीन से जोड़ता है। मुहावरों, लोकोक्तियों और बोलचाल की अभिव्यक्तियों ने उनके पात्रों को वास्तविकता प्रदान की। उनके संवाद पात्रों की सामाजिक स्थिति, मनोवृत्ति और परिवेश को उजागर करते हैं। उनकी भाषा में जहां आवश्यकता होती है वहां करुणा है, कहीं व्यंग्य है, कहीं हास्य है और कहीं ऐसी मार्मिकता है जो पाठक के मन में देर तक बनी रहती है।

साहित्यिक पत्रकारिता और ‘हंस’

प्रेमचंद ने साहित्य-सृजन के साथ साहित्यिक पत्रकारिता को भी महत्वपूर्ण दिशा दी। हंस जैसी पत्रिका के माध्यम से उन्होंने साहित्य और सामाजिक सरोकारों के बीच संवाद को मजबूत किया। उनका मानना था कि साहित्य समाज से कटकर जीवित नहीं रह सकता। इसलिए उन्होंने ऐसे लेखन को प्रोत्साहित किया जिसमें जीवन की वास्तविक समस्याएं, सामाजिक परिवर्तन और मानवीय सरोकार मौजूद हों। 1936 में लखनऊ में आयोजित प्रगतिशील लेखक संघ के प्रथम सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने साहित्य की सामाजिक भूमिका को स्पष्ट किया। उनके विचारों ने आगे चलकर हिंदी और उर्दू के प्रगतिशील साहित्य पर व्यापक प्रभाव डाला।

प्रेमचंद और सिनेमा

प्रेमचंद का रचनात्मक संसार केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने मुंबई जाकर फिल्म जगत से भी जुड़ने का प्रयास किया और मजदूर जैसी फिल्म के लिए लेखन किया। उनकी रचनाओं पर आगे चलकर अनेक फिल्में और नाट्य प्रस्तुतियां बनीं। शतरंज के खिलाड़ी जैसी रचना का फिल्म रूपांतरण यह प्रमाणित करता है कि प्रेमचंद की कथा-शक्ति साहित्य की सीमाओं से आगे जाकर दृश्य माध्यमों में भी प्रभाव पैदा करती है।

प्रेमचंद का मानवीय दर्शन

प्रेमचंद के साहित्य के केंद्र में अंततः मनुष्य ही है। उनके लिए मनुष्य की पहचान उसकी जाति, वर्ग, संपत्ति या सामाजिक प्रतिष्ठा से बड़ी है। उनके पात्र परिस्थितियों से लड़ते हैं, हारते हैं, कभी गलत निर्णय लेते हैं, कभी कमजोर पड़ते हैं, लेकिन वे पूरी तरह अमानवीय नहीं होते। प्रेमचंद की करुणा भावुकता नहीं है। वह सामाजिक विवेक से जुड़ी करुणा है। वे पाठक को पीड़ित मनुष्य के प्रति सहानुभूति रखने के साथ यह सोचने के लिए भी प्रेरित करते हैं कि आखिर वह व्यवस्था कैसी है जो मनुष्य को पीड़ा में धकेलती है।

अंतिम पड़ाव और अमर विरासत

जीवन के अंतिम वर्षों में आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी कठिनाइयों के बावजूद प्रेमचंद का लेखन रुका नहीं। इसी दौर में उनकी महान कृति गोदान सामने आई। 8 अक्टूबर 1936 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनका साहित्य उसी क्षण एक नए जीवन में प्रवेश कर गया। उनकी रचनाओं का अनेक भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ। विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों में उनके साहित्य का अध्ययन लगातार जारी रहा। रंगमंच और सिनेमा ने उनके पात्रों को नए रूप में जीवित किया। उनकी लोकप्रियता का रहस्य केवल उनकी भाषा की सरलता में नहीं है। असली कारण यह है कि उन्होंने मनुष्य की उन मूल समस्याओं को पहचाना जो समय और परिस्थितियों के बदलने के बावजूद पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं।

आज के समय में प्रेमचंद की प्रासंगिकता

आज जब दुनिया तकनीक, बाजार और तेज आर्थिक परिवर्तन के दौर से गुजर रही है, तब भी किसान, श्रम, सामाजिक असमानता, स्त्री सम्मान, आर्थिक विषमता और वंचित वर्गों के अधिकार जैसे प्रश्न हमारे सामने मौजूद हैं। यही कारण है कि प्रेमचंद को पढ़ना केवल साहित्य के इतिहास को पढ़ना नहीं है; यह समाज को समझने की एक प्रक्रिया भी है। आज का पाठक जब गोदान पढ़ता है तो उसे केवल बीसवीं सदी का किसान दिखाई नहीं देता। वह श्रम, कर्ज, आर्थिक असुरक्षा और सम्मान की उस सार्वकालिक चिंता को भी पहचान सकता है जो अलग-अलग रूपों में आज मौजूद है। इसी प्रकार निर्मला सामाजिक रूढ़ियों पर विचार करने को प्रेरित करती है और ठाकुर का कुआं तथा सद्गति समानता और सामाजिक गरिमा के प्रश्नों को सामने लाती हैं। ईदगाह हमें बताती है कि संवेदना की कोई आर्थिक सीमा नहीं होती। प्रेमचंद का साहित्य इसलिए पुराना नहीं हुआ क्योंकि उन्होंने अपने समय की घटनाओं से आगे बढ़कर मनुष्य की मूल संवेदनाओं को पकड़ा था।

संघर्ष, संवेदना और सृजन से बनी प्रेमचंद की पहचान

मुंशी प्रेमचंद हिंदी साहित्य के केवल महान कथाकार नहीं, बल्कि भारतीय समाज की अंतरात्मा को शब्द देने वाले साहित्यकार थे। उन्होंने अपनी कलम से उस भारत का चित्र खींचा जिसे अक्सर इतिहास की बड़ी घटनाओं के बीच अनदेखा कर दिया जाता है। उनके साहित्य में खेत में पसीना बहाता किसान है, घर की चारदीवारी में संघर्ष करती स्त्री है, भूख से जूझता गरीब है, जातिगत भेदभाव का शिकार मनुष्य है, सपने देखता बच्चा है और व्यवस्था से लड़ता सामान्य नागरिक है। उनका जीवन स्वयं यह संदेश देता है कि विपरीत परिस्थितियां प्रतिभा का रास्ता रोक सकती हैं, लेकिन संकल्प और संवेदना से भरे मनुष्य की दृष्टि को बंद नहीं कर सकतीं। अभावों की पाठशाला से निकलकर प्रेमचंद ने साहित्य के ऐसे शिखर को छुआ, जहां पहुंचकर लेखक स्वयं एक संस्था बन जाता है।

शब्दों की वह रोशनी, जो समय की आंधियों में भी बुझी नहीं

उनकी कलम ने समाज को आईना दिखाया, लेकिन केवल चेहरा दिखाकर चुप नहीं हुई। उसने उन दरारों की ओर भी संकेत किया, जहां से सामाजिक विषमता, शोषण और अन्याय भीतर प्रवेश करते हैं। उन्होंने साहित्य को जीवन की धड़कन से जोड़ा और यह सिद्ध किया कि सच्चा साहित्य समय का दस्तावेज होने के साथ-साथ भविष्य के लिए चेतावनी और दिशा भी हो सकता है। प्रेमचंद की सबसे बड़ी विरासत शायद यही है कि उन्होंने साहित्य के केंद्र में मनुष्य को स्थापित किया। उनके पात्र भले ही किसी बीते युग से आते हों, उनकी पीड़ा, आकांक्षाएं, संघर्ष और स्वाभिमान आज भी हमारे बीच सांस लेते हैं। उनकी रचनाएं हमें केवल यह नहीं बतातीं कि हमारा समाज कैसा था, बल्कि यह प्रश्न भी पूछती हैं कि वह कैसा होना चाहिए। इस अर्थ में प्रेमचंद की मृत्यु 8 अक्टूबर 1936 को हुई, लेकिन उनके शब्दों की यात्रा वहीं समाप्त नहीं हुई। वह यात्रा आज भी जारी है। जब तक समाज में असमानता के विरुद्ध आवाज उठेगी, जब तक किसी किसान की आंख में बेहतर जीवन का सपना होगा, जब तक कोई वंचित मनुष्य सम्मान की तलाश करेगा और जब तक साहित्य मनुष्य के पक्ष में खड़ा रहेगा, तब तक प्रेमचंद की कलम की रोशनी बनी रहेगी। प्रेमचंद सचमुच साहित्य के वह दीपक हैं, जिसकी लौ समय की आंधियों से बुझी नहीं, बल्कि हर नई पीढ़ी के हाथों में पहुंचकर और अधिक उजली होती गई।

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