नई दिल्ली। दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के दौरान पुलिस की Facial Recognition System यानी FRS तकनीक के इस्तेमाल को लेकर अब गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। पुलिस ने दावा किया था कि प्रदर्शन में 2,873 ऐसे लोग शामिल हुए थे, जिनका आपराधिक रिकॉर्ड पुलिस के डेटाबेस में मौजूद है। लेकिन इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल में इस दावे की विश्वसनीयता पर सवाल उठे हैं।रिपोर्ट के अनुसार, प्रदर्शन में शामिल बताए गए 2,873 लोगों में से 200 नामों की जांच की गई। इनमें 25 ऐसे लोग मिले जो प्रदर्शन के समय जेल में बंद थे। ऐसे में सवाल यह है कि जब ये लोग जेल से बाहर ही नहीं आए थे, तो Facial Recognition System ने इन्हें प्रदर्शन में मौजूद लोगों के तौर पर कैसे पहचान लिया।
पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में भी रखा था आंकड़ा
पुलिस के मुताबिक प्रदर्शन के दौरान FRS ने 2,873 चेहरों का मिलान ऐसे लोगों के रिकॉर्ड से किया, जिनके नाम पुलिस के आपराधिक डेटाबेस में दर्ज थे। इनमें 2,402 लोगों का मिलान क्राइम कुंडली डेटाबेस से और 471 लोगों का मिलान डोजियर रिकॉर्ड से किए जाने की बात कही गई थी।पुलिस ने यह आंकड़ा सुप्रीम कोर्ट के समक्ष भी पेश किया था। लेकिन जेल में बंद लोगों के नाम सामने आने के बाद तकनीकी पहचान प्रक्रिया और उसके आधार पर तैयार किए गए आंकड़ों पर सवाल खड़े हो गए हैं।
जांच में सामने आए गंभीर मामलों वाले नाम
इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल में जिन25 लोगों के जेल में होने की बात सामने आई, उनमें कुछ लोग हत्या, दुष्कर्म और हत्या के प्रयास जैसे गंभीर आरोपों से जुड़े मामलों में बंद बताए गए हैं।इससे FRS से मिलने वाले किसी भी मैच को सीधे तौर पर व्यक्ति की मौजूदगी का प्रमाण मानने को लेकर बहस और तेज हो गई है।
Facial Recognition System की सटीकता पर बहस
Facial Recognition System कैमरे से मिले चेहरे की तस्वीर का उपलब्ध डेटाबेस से मिलान करता है। लेकिन तस्वीर की गुणवत्ता, रोशनी, कैमरे का एंगल, चेहरे की स्थिति और अन्य तकनीकी परिस्थितियां पहचान के परिणाम को प्रभावित कर सकती हैं।ऐसी तकनीक में गलत पहचान यानी false positive की संभावना को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता। इसलिए किसी व्यक्ति के चेहरे का डेटाबेस से मैच होना और उसका वास्तव में किसी स्थान पर मौजूद होना दो अलग-अलग बातें हो सकती हैं।
तकनीक के इस्तेमाल के साथ जरूरी है स्वतंत्र सत्यापन
पुलिस का तर्क है कि FRS अपराधियों और संदिग्धों की पहचान करने तथा कानून-व्यवस्था मजबूत करने में मददगार तकनीक है। हालांकि, इस मामले ने इसके इस्तेमाल की प्रक्रिया पर महत्वपूर्ण सवाल खड़े किए हैं।सबसे अहम सवाल यह है कि FRS से मिले मैच के बाद पुलिस ने कितनी स्वतंत्र जांच की? क्या केवल तकनीकी मिलान के आधार पर किसी व्यक्ति को प्रदर्शन में मौजूद माना गया या CCTV फुटेज, मौके के वीडियो और दूसरे साक्ष्यों से भी इसकी पुष्टि की गई?
निजता और निगरानी को लेकर भी बढ़ी चिंता
प्रदर्शन में शामिल लोगों की पहचान के लिए Facial Recognition System का इस्तेमाल निजता और सरकारी निगरानी के अधिकार को लेकर भी बहस पैदा करता है। तकनीक का इस्तेमाल अपराध की रोकथाम में कितना उपयोगी है और नागरिकों की निजता की सीमा कहां तय होनी चाहिए, यह सवाल अब और महत्वपूर्ण हो गया है।इस पूरे मामले में जेल में बंद लोगों के नाम प्रदर्शनकारी के तौर पर सामने आना सिर्फ एक तकनीकी गलती का सवाल नहीं है। यह इस बात की जांच की जरूरत भी दिखाता है कि Facial Recognition से मिले नतीजों को आधिकारिक दावे में शामिल करने से पहले उनका स्वतंत्र और पर्याप्त सत्यापन किस तरह किया गया था।



















