जबलपुर। मध्य प्रदेश में खेती के तरीके तेजी से बदल रहे हैं और अब किसान पारंपरिक फसलों से आगे बढ़कर नए विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं। मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व में चल रही कृषक हितैषी नीतियों और फसल विविधीकरण अभियान का असर अब जमीन पर साफ दिखाई दे रहा है। जबलपुर जिले में इस साल ग्रीष्मकालीन सीजन में तिल की खेती ने नया रिकॉर्ड बना दिया है।

पहली बार बड़े पैमाने पर तिल की खेती, किसानों में बढ़ा भरोसा
कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार, जहां पिछले साल गर्मी के मौसम में तिल की खेती का रकबा शून्य था, वहीं इस बार किसानों ने 366 हेक्टेयर में इसकी बुआई कर दी है। यह बदलाव बताता है कि अब किसान बाजार की मांग और फायदे को ध्यान में रखकर फसल का चयन कर रहे हैं।

कम लागत, ज्यादा मुनाफा, किसानों को रास आ रही तिल की फसल
विशेषज्ञों का मानना है कि तिल की खेती गर्मी के मौसम के लिए बेहद अनुकूल है। इसमें सिंचाई की जरूरत बहुत कम होती है, जिससे पानी की बचत होती है। साथ ही खाद और कीटनाशकों पर खर्च भी अन्य फसलों के मुकाबले कम आता है। दूसरी ओर बाजार में तिल, खासकर सफेद तिल की कीमत अच्छी मिलने से किसानों को बेहतर लाभ की उम्मीद रहती है।

कम रोग, बेहतर मिट्टी, अगली फसल को भी फायदा
तिल की खेती का एक और बड़ा फायदा यह है कि इसमें कीट और रोगों का खतरा अपेक्षाकृत कम रहता है। इसके अलावा यह फसल मिट्टी की गुणवत्ता को भी सुधारती है, जिससे अगली फसलों की पैदावार बेहतर होती है। इस तरह यह खेती न केवल मौजूदा सीजन बल्कि भविष्य के लिए भी लाभकारी साबित हो रही है।

किसानों की सोच में बदलाव, बाजार आधारित खेती की ओर कदम
जिले में तिल की खेती का बढ़ता रकबा इस बात का संकेत है कि किसान अब प्रयोगधर्मी हो रहे हैं और पारंपरिक खेती के दायरे से बाहर निकलकर नई संभावनाएं तलाश रहे हैं। यह बदलाव न सिर्फ किसानों की आय बढ़ाने में मदद करेगा, बल्कि कृषि अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देगा।

खेती में बदलाव से आय बढ़ाने का रास्ता, संतुलित कृषि की ओर बढ़ता कदम
विशेषज्ञों का कहना है कि फसल चक्र में बदलाव अपनाकर किसान अपनी आय को बेहतर कर सकते हैं और साथ ही प्राकृतिक संसाधनों के संतुलन को भी बनाए रख सकते हैं। जबलपुर में तिल की खेती की यह पहल आने वाले समय में अन्य जिलों के लिए भी प्रेरणा बन सकती है।

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