
रायपुर: छत्तीसगढ़ की समृद्ध जनजातीय संस्कृति और सदियों पुरानी लोकपरंपराओं का प्रतीक बस्तर दशहरा 2026 में एक खास वजह से चर्चा में है। केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू और संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री राजेश अग्रवाल ने नई दिल्ली में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात कर उन्हें विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा में शामिल होने का आमंत्रण दिया। राष्ट्रपति की ओर से आमंत्रण पर सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलने के बाद उनके पर्व में शामिल होने की संभावना बढ़ी है।
राष्ट्रपति मुर्मू को दिया गया विशेष निमंत्रण
संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री राजेश अग्रवाल ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात के दौरान उन्हें बस्तर दशहरा में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने इस पर्व को छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान और जनजातीय विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया।
राजेश अग्रवाल ने सोशल मीडिया के जरिए मुलाकात की जानकारी साझा करते हुए कहा कि राष्ट्रपति को बस्तर की गौरवशाली परंपरा से जुड़े इस आयोजन में आने के लिए सादर आमंत्रित किया गया है।
राष्ट्रपति ने क्या कहा
मुलाकात के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने आमंत्रण को सहर्ष स्वीकार किया। उन्होंने कार्यक्रम में शामिल होने का प्रयास करने की बात कही। राष्ट्रपति की इस प्रतिक्रिया के बाद बस्तर दशहरा में उनकी संभावित मौजूदगी को लेकर उत्सुकता बढ़ गई है।
मुलाकात में ये प्रमुख लोग रहे मौजूद
राष्ट्रपति से हुई इस मुलाकात के दौरान केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू, बस्तर सांसद महेश कश्यप और संस्कृति एवं पर्यटन विभाग के सचिव डॉ. एस. भारतीदासन भी मौजूद रहे।
संस्कृति मंत्री ने इस मुलाकात को यादगार बताते हुए कहा कि राष्ट्रपति को बस्तर दशहरा के लिए आमंत्रित करना राज्य की सांस्कृतिक और जनजातीय विरासत के लिए महत्वपूर्ण अवसर है।
75 दिनों तक क्यों चलता है बस्तर दशहरा
जगदलपुर में आयोजित होने वाला बस्तर दशहरा देश के सबसे अलग सांस्कृतिक आयोजनों में शामिल है। सामान्य दशहरा उत्सवों से अलग इसकी अवधि करीब 75 दिनों की होती है। इसकी शुरुआत सावन महीने की हरियाली अमावस्या से होती है और अलग-अलग पारंपरिक रस्मों के साथ यह आयोजन अश्विन मास तक चलता है।
इस दौरान बस्तर की विभिन्न जनजातीय परंपराओं, धार्मिक मान्यताओं और लोकरीतियों की झलक देखने को मिलती है।
यहां नहीं जलाया जाता रावण का पुतला
बस्तर दशहरा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां रावण के पुतले का दहन नहीं किया जाता। इसका संबंध भगवान राम और रावण के बीच हुए युद्ध की परंपरागत कथा से अलग स्थानीय आस्था और मां दंतेश्वरी की आराधना से है।
पर्व के दौरान बस्तर की जनजातीय परंपराएं और स्थानीय धार्मिक मान्यताएं प्रमुख भूमिका निभाती हैं। यही वजह है कि इसे केवल दशहरा उत्सव के तौर पर नहीं, बल्कि बस्तर की सांस्कृतिक पहचान के बड़े प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
15वीं शताब्दी से जुड़ा है पर्व का इतिहास
बस्तर दशहरा की परंपरा का इतिहास 15वीं शताब्दी से जुड़ा बताया जाता है। मान्यता के अनुसार काकतीय वंश के महाराजा पुरुषोत्तम देव के समय इस उत्सव की परंपरा को विशेष स्वरूप मिला। सदियों बाद भी इसकी मूल लोकपरंपराएं और जनजातीय स्वरूप कायम हैं।
यही वजह है कि हर साल बस्तर दशहरा देश-विदेश से आने वाले लोगों के लिए छत्तीसगढ़ की आदिवासी संस्कृति, आस्था और लोकजीवन को करीब से समझने का महत्वपूर्ण अवसर बनता है।




















