
देहरादून: उत्तराखंड के मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस दाखिले के लिए स्वतंत्रता सेनानी आश्रित श्रेणी से जुड़े कथित फर्जी प्रमाणपत्रों के इस्तेमाल का मामला सामने आने के बाद देहरादून पुलिस की विशेष जांच टीम (SIT) ने जांच शुरू कर दी है। मामले में दो अलग-अलग थानों में मुकदमे भी दर्ज किए गए हैं।
एसपी देहात जया बलूनी ने बताया कि जिन मामलों में स्वतंत्रता सेनानी आश्रित होने के कथित फर्जी प्रमाणपत्रों के जरिए एमबीबीएस में दाखिला लेने की बात सामने आई है, उनसे संबंधित दस्तावेज विभिन्न विभागों और अधिकारियों से मांगे गए हैं। पुलिस फिलहाल प्रमाणपत्रों और दाखिला प्रक्रिया से जुड़े रिकॉर्ड की जांच कर रही है। उन्होंने कहा कि जांच शुरुआती दौर में है, इसलिए किसी संगठित गिरोह की भूमिका को लेकर अभी कोई निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
अधिवास प्रमाणपत्रों पर भी उठे सवाल
मामले को सामने लाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार प्रदीप बहुगुणा ने मेडिकल दाखिलों में इस्तेमाल किए गए अधिवास प्रमाणपत्रों की भी व्यापक जांच की मांग की है। उनका कहना है कि स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाणपत्रों की जांच के दौरान कुछ अभ्यर्थियों के अधिवास दस्तावेजों को लेकर भी सवाल सामने आए।
पुलिस के मुताबिक, फिलहाल दर्ज दोनों मुकदमे स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाणपत्रों से जुड़ी कथित धोखाधड़ी और इन प्रमाणपत्रों के आधार पर हासिल किए गए दाखिलों पर केंद्रित हैं। अधिवास प्रमाणपत्रों से जुड़े आरोपों की अलग से जांच की मांग की गई है।
बहुगुणा ने करीब 350 अभ्यर्थियों की सूची भी चिकित्सा शिक्षा मंत्री सुबोध उनियाल को सौंपी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सूची में शामिल सभी अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्रों को फर्जी नहीं बताया जा रहा है, बल्कि रिकॉर्ड और दाखिला प्रक्रिया से जुड़े संदेहों के आधार पर दस्तावेजों के सत्यापन की मांग की गई है।
मंत्री ने एक सप्ताह में मांगी रिपोर्ट
चिकित्सा शिक्षा मंत्री सुबोध उनियाल ने मामले को गंभीरता से लेते हुए देहरादून जिलाधिकारी को जांच के निर्देश दिए हैं। जिलाधिकारी से एक सप्ताह के भीतर रिपोर्ट मांगी गई है। जांच में यह भी पता लगाने के निर्देश दिए गए हैं कि यदि कोई प्रमाणपत्र गलत तरीके से जारी हुआ है तो उसकी प्रक्रिया में किस स्तर पर गड़बड़ी हुई।मंत्री के अनुसार, यदि जांच में किसी अभ्यर्थी का दाखिला जाली प्रमाणपत्र के आधार पर होना साबित होता है तो नियमों के तहत दाखिला रद्द करने जैसी कार्रवाई की जा सकती है।
रिकॉर्ड जांच में सामने आए सवाल
बहुगुणा के मुताबिक, स्वतंत्रता सेनानी आश्रित श्रेणी के कुछ अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्रों का ऑनलाइन रिकॉर्ड से सत्यापन किया गया। इसमें कुछ प्रमाणपत्र नंबर पोर्टल पर नहीं मिलने और एक मामले में प्रमाणपत्र या आवेदन संख्या किसी अन्य व्यक्ति से संबंधित पाए जाने का दावा किया गया है। एक अन्य मामले में ऑनलाइन आवेदन की स्थिति लंबित दिखने के बावजूद सीट आवंटित किए जाने का भी दावा किया गया।हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। किसी अन्य राज्य में पढ़ाई करने या वहां से NEET में शामिल होने मात्र से किसी अभ्यर्थी के प्रमाणपत्र को फर्जी नहीं माना जा सकता।
चार CSC केंद्र सील
मामले के बीच 17 सितंबर को देहरादून प्रशासन ने कई कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) का औचक निरीक्षण किया। प्रशासन के अनुसार, अनियमितताएं मिलने पर चार CSC केंद्रों को सील किया गया और कुछ कंप्यूटर व लैपटॉप जब्त किए गए।
CSC संचालक रोहित नेगी के मुताबिक, केंद्रों की भूमिका आमतौर पर ऑनलाइन आवेदन भरने और दस्तावेज अपलोड करने तक सीमित रहती है। प्रमाणपत्र जारी करने से पहले संबंधित आवेदन सरकारी प्रक्रिया से गुजरता है, जिसमें तहसील, राजस्व अधिकारियों और पटवारी स्तर पर सत्यापन के बाद सक्षम अधिकारी की मंजूरी शामिल होती है।
अब SIT की जांच में प्रमाणपत्रों के इस्तेमाल के साथ-साथ उनके जारी होने की पूरी प्रक्रिया की भी पड़ताल की जा रही है। जांच रिपोर्ट के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि कितने प्रमाणपत्रों में वास्तविक अनियमितता थी और इसके लिए कौन जिम्मेदार है।




















