

जहां टपकती थी झोपड़ी, आज खड़ा है उम्मीदों का पक्का घर
नक्सल हिंसा की पीड़ा से विकास की राह तक, बदली एक परिवार की कहानी
बलरामपुर।एक पल में सब कुछ बदल गया। नक्सलियों ने पुलिस मुखबिर होने के संदेह में आसिम आंसारी की हत्या कर दी। परिवार का सहारा छिन गया। पीछे रह गईं उनकी पत्नी, छोटे-छोटे बच्चे और जंगल के बीच बनी एक कच्ची झोपड़ी, जो हर बारिश में टपकती थी और हर रात असुरक्षा का एहसास कराती थी। आर्थिक तंगी, भय और अनिश्चित भविष्य के बीच इस परिवार के लिए दो वक्त की रोटी जुटाना भी किसी चुनौती से कम नहीं था।
झारखंड की सीमा से लगे बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के जनपद पंचायत कुसमी अंतर्गत ग्राम पंचायत चुनचुना का यह परिवार वर्षों तक अभावों में जीता रहा। गांव की दुर्गमता और नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने के कारण परिस्थितियां और भी कठिन थीं। लेकिन शासन की संवेदनशील पहल ने इस परिवार की जिंदगी की दिशा बदल दी। जब असीम आंसारी की पत्नी निमजनी अंसारी को आवास का लाभ दिया गया।
बरसात की रातें इस परिवार के लिए सबसे कठिन होती थीं। तेज बारिश शुरू होते ही झोपड़ी से पानी टपकने लगता था। कभी बच्चों को सूखी जगह पर बैठाकर रात काटनी पड़ती, तो कभी भीगते सामान को बचाने की चिंता सताती। हर नई सुबह एक ही सवाल लेकर आती थी कि क्या कभी अपना भी पक्का घर होगा।
इसी बीच मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में स्पेशल प्रोजेक्ट के माध्यम से नक्सल पीड़ित एवं आत्मसमर्पित परिवार को आवास देने का अभियान चलाया गया। जो परिवार के जीवन में उम्मीद की किरण बनकर आई। प्रशासन ने परिवार की स्थिति को गंभीरता लेते हुए आवास स्वीकृत किया और ग्राम पंचायत के सहयोग से निर्माण कार्य शुरू हुआ। धीरे-धीरे ईंटें जुड़ती गईं और वर्षों का सपना आकार लेने लगा।
जिस स्थान पर कभी एक जर्जर झोपड़ी थी, वहीं आज मजबूत दीवारों और पक्की छत वाला घर खड़ा है।अब बच्चों के चेहरे पर मुस्कान है, बरसात का डर खत्म हो चुका है और परिवार भविष्य के सपने देखने लगा है। कभी जो परिवार असुरक्षा और अभाव में जीवन गुजार रहा था, आज वही सम्मान और सुकून के साथ अपने नए आशियाने में जीवन बिता रहा है।
उनके बच्चे सरफुद्दीन और शादिब अंसारी कहते है कि हमने कभी नहीं सोचा था कि हमारा भी पक्का घर होगा पापा के जाने के बाद लगा था कि अब जिंदगी ऐसे ही गुजर जाएगी। लेकिन अब जब भी अपने पक्के घर का दरवाजा बंद करते हैं, तो लगता है कि हमार भविष्य अब सुरक्षित है
जिस गांव में कभी गोलियों की आवाज़ डर पैदा करती थी, कभी नक्सल हिंसा की पीड़ा और अभाव इस परिवार की पहचान थे, लेकिन आज पक्के घर की मजबूत दीवारें उनके बेहतर भविष्य की गवाही दे रही हैं।वहीं आज एक पक्के घर की दीवारें उम्मीद की कहानी कह रही हैं कि बलरामपुर अब बदल रहा है। यहां विकास की किरण उन परिवारों तक भी पहुंच रही है, जिनके जीवन में कभी केवल संघर्ष और निराशा थी। यही बदलता हुआ बलरामपुर है जहां संवेदनशील शासन प्रशासन कठिन परिस्थितियों में जी रहे परिवारों के जीवन को नई दिशा देकर खुशियों का नया अध्याय लिख रहा है।











