

CG News: छत्तीसगढ हाईकोर्ट ने विधायक और छत्तीसगढी अभिनेता अनुज शर्मा से जुड़े कथित आपत्तिजनक सोशल मीडिया पोस्टों के मामले में कडा रुख अपनाया है। अदालत ने प्रथम दृष्टया मामले को गंभीर मानते हुए उनके और उनके परिवार से संबंधित मॉर्फ तस्वीरें, एडिटेड वीडियो, आपत्तिजनक कैरिकेचर तथा अशोभनीय टिप्पणियों को तत्काल हटाने के निर्देश दिए हैं। साथ ही संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और कंटेंट अपलोड करने वाले अकाउंट संचालकों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
फर्जी अकाउंट के जरिए बदनाम करने का आरोप
याचिका में आरोप लगाया गया है कि फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर कई फर्जी और गुमनाम अकाउंट के माध्यम से अनुज शर्मा को निशाना बनाया गया। उनके नाम, तस्वीर और पहचान का उपयोग कर कथित रूप से एडिटेड वीडियो, मॉर्फ फोटो, आपत्तिजनक कैरिकेचर और भ्रामक सामग्री प्रसारित की गई। इतना ही नहीं, उनके फिल्मों और गीतों के अंशों को भी संपादित कर अलग संदर्भ में वायरल करने का आरोप लगाया गया है।
अदालत में उठाया गया व्यक्तित्व अधिकार का मुद्दा
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि किसी भी व्यक्ति की तस्वीर, आवाज या पहचान का उसकी अनुमति के बिना उपयोग करना उसके व्यक्तित्व अधिकार का उल्लंघन है। साथ ही यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त गरिमा और निजता के अधिकार पर भी सीधा आघात है। अदालत को यह भी बताया गया कि अनुज शर्मा जनप्रतिनिधि होने के साथ पद्मश्री सम्मान से सम्मानित कलाकार भी हैं और उनकी लोकप्रियता का अनुचित लाभ उठाने की कोशिश की गई।
हाईकोर्ट ने जारी किए सख्त निर्देश
मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को निर्देश दिया कि अनुज शर्मा और उनके परिवार से जुड़ी सभी कथित आपत्तिजनक पोस्ट, मॉर्फ वीडियो, एडिटेड तस्वीरें और अन्य सामग्री बिना देरी हटाई जाए। इसके अलावा संबंधित अकाउंट संचालकों, कंटेंट क्रिएटर्स और चैनल एडमिन्स को नोटिस जारी कर विस्तृत जवाब प्रस्तुत करने के आदेश भी दिए गए हैं।
अनुज शर्मा बोले, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब व्यक्तिगत हमला नहीं
हाईकोर्ट के आदेश के बाद अनुज शर्मा ने कहा कि वे मीडिया और आम जनता का पूरा सम्मान करते हैं, लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में किसी व्यक्ति या उसके परिवार की प्रतिष्ठा, निजता और सम्मान को ठेस पहुंचाना स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए उन्हें न्यायालय की शरण लेनी पड़ी। साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी की अभिव्यक्ति पर रोक लगाना नहीं, बल्कि सोशल मीडिया का दुरुपयोग कर व्यक्तिगत और राजनीतिक स्वार्थ साधने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करना है।











