

अभिषेक कुमार सोनी
भारतीय लोकतंत्र में जंतर-मंतर केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि जनभावनाओं का ऐसा मंच है, जहां समय-समय पर समाज के विभिन्न वर्ग अपनी पीड़ा, अपेक्षाएं और अधिकारों की मांग लेकर पहुंचते रहे हैं। वर्ष 2026 का जंतर-मंतर आंदोलन भी इसी लोकतांत्रिक परंपरा की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। हालांकि इसकी शुरुआत प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं, पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग से हुई, लेकिन समय के साथ यह केवल छात्रों का आंदोलन नहीं रहा। यह युवाओं के भविष्य, रोजगार, पारदर्शिता, जवाबदेही और शासन व्यवस्था में विश्वास के संकट का राष्ट्रीय प्रतीक बन गया।
भारत विश्व का सबसे युवा देश बनने की ओर अग्रसर है। करोड़ों युवा अपने जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में व्यतीत करते हैं। परिवार अपनी सीमित आय का बड़ा हिस्सा बच्चों की शिक्षा और कोचिंग पर खर्च करते हैं। ऐसे में यदि किसी परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं या भर्ती प्रक्रिया वर्षों तक लंबित रहती है, तो केवल एक परीक्षा प्रभावित नहीं होती, बल्कि लाखों सपने, परिवारों की उम्मीदें और व्यवस्था पर भरोसा भी कमजोर पड़ता है।
यही कारण है कि जंतर-मंतर पर उठी आवाज़ को देशभर के युवाओं का समर्थन मिला। सोशल मीडिया ने इस आंदोलन को राष्ट्रीय स्वरूप दिया और देखते ही देखते यह केवल दिल्ली तक सीमित नहीं रहा। यह इस बात का प्रमाण है कि आज का युवा पहले की तुलना में अधिक जागरूक, संगठित और अपने अधिकारों के प्रति सजग है।
हालांकि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध-प्रदर्शन नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन इसके साथ कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी भी है। संसद मार्च के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़पों ने कई प्रश्न खड़े किए। क्या संवाद पहले शुरू नहीं किया जा सकता था? क्या आंदोलनकारियों को अपनी बात रखने का अधिक प्रभावी अवसर नहीं मिलना चाहिए था? और क्या प्रदर्शनकारियों को भी अपने विरोध को पूरी तरह शांतिपूर्ण बनाए रखने की अतिरिक्त जिम्मेदारी नहीं निभानी चाहिए थी? इन प्रश्नों के उत्तर केवल सरकार या आंदोलनकारियों के पास नहीं, बल्कि लोकतंत्र की सामूहिक चेतना में निहित हैं।
यह आंदोलन राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण रहा। सत्ता पक्ष ने कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक दायित्वों का हवाला दिया, जबकि विपक्ष ने इसे युवाओं के भविष्य का प्रश्न बताया। लेकिन वास्तविकता यह है कि शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दों को राजनीतिक लाभ-हानि के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। यह राष्ट्रीय विकास और सामाजिक स्थिरता का विषय है।
इस आंदोलन का सबसे बड़ा संदेश यह है कि युवा केवल रोजगार नहीं चाहते, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था चाहते हैं जिस पर वे भरोसा कर सकें। वे चाहते हैं कि परीक्षा समय पर हो, निष्पक्ष हो, परिणाम समय पर आएं और योग्य अभ्यर्थियों को बिना किसी संदेह के अवसर मिले। यदि व्यवस्था यह विश्वास कायम नहीं कर पाती, तो असंतोष का बढ़ना स्वाभाविक है।
सरकार के लिए भी यह आत्ममंथन का अवसर है। केवल आंदोलन समाप्त हो जाना समस्या के समाप्त होने का प्रमाण नहीं होता। यदि व्यवस्था में पारदर्शिता, तकनीकी सुरक्षा, समयबद्ध भर्ती और जवाबदेही सुनिश्चित नहीं की गई, तो भविष्य में ऐसे आंदोलन और अधिक व्यापक रूप ले सकते हैं। दूसरी ओर, आंदोलनकारियों के लिए भी यह आवश्यक है कि लोकतांत्रिक विरोध की गरिमा बनी रहे, क्योंकि किसी भी जनआंदोलन की सबसे बड़ी शक्ति उसकी नैतिक वैधता होती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार, परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाएं, न्यायपालिका, शिक्षा विशेषज्ञ और छात्र संगठन एक साझा संवाद की प्रक्रिया शुरू करें। परीक्षा सुधार, भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता, तकनीकी सुरक्षा, समयबद्ध परिणाम और दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई जैसे मुद्दों पर ठोस नीतिगत निर्णय लिए जाएं। केवल आश्वासन नहीं, बल्कि संस्थागत सुधार ही युवाओं का विश्वास पुनः स्थापित कर सकते हैं।
जंतर-मंतर का ये आंदोलन इतिहास में केवल एक विरोध प्रदर्शन के रूप में दर्ज नहीं होगा, यह उस पीढ़ी की आवाज़ है, जो अवसरों की समानता, ईमानदार व्यवस्था और जवाबदेह शासन की मांग कर रही है। लोकतंत्र की शक्ति इसी में है कि वह असहमति को सुने, उसका सम्मान करे और समय रहते आवश्यक सुधार करे।
प्रश्न केवल इतना नहीं है कि जंतर-मंतर पर कितने लोग जुटे। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या व्यवस्था ने उनकी आवाज़ सुनी? यदि इस आंदोलन से शिक्षा और भर्ती व्यवस्था में ठोस सुधार होते हैं, तो इसे भारतीय लोकतंत्र की सकारात्मक उपलब्धि माना जाएगा। लेकिन यदि यह आवाज़ भी समय के शोर में दब गई, तो भविष्य में उठने वाली आवाज़ें शायद और अधिक तीखी तथा व्यापक होंगी।











