बिलासपुर : हाई कोर्ट ने राज्यपाल की क्षमादान शक्ति को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल को प्राप्त अधिकार स्वतंत्र संवैधानिक शक्ति है। यदि राज्यपाल किसी दोषी की दया याचिका एक बार खारिज कर देते हैं, तो जेल नियमों में उसी याचिका पर दोबारा विचार करने का कोई प्रावधान नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि कार्यपालिका के ऐसे निर्णयों में न्यायपालिका तब तक हस्तक्षेप नहीं कर सकती, जब तक निर्णय पूरी तरह दुर्भावनापूर्ण या कानून के विपरीत न हो।

हत्या के दोषी की याचिका खारिज

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे नीरज माली उर्फ गोलू की रिट याचिका खारिज कर दी। अदालत ने माना कि राज्यपाल के पहले से दिए गए निर्णय पर पुनर्विचार की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती।

क्या था पूरा मामला

नीरज माली को वर्ष 2001 में बिलासपुर की अदालत ने हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। बाद में हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी इस सजा को बरकरार रखा। वर्ष 2016 में उसने राज्यपाल के समक्ष दया याचिका दायर की थी। जेल अधीक्षक, पुलिस अधीक्षक और जिला प्रशासन ने उसके अच्छे आचरण के आधार पर समय पूर्व रिहाई की अनुशंसा भी की थी।

हालांकि 24 मार्च 2023 को राज्यपाल ने दया याचिका अस्वीकार कर दी। इसके बाद वर्ष 2023 में उसकी पत्नी ने पारिवारिक और मानवीय आधारों का हवाला देते हुए फैसले पर पुनर्विचार का आवेदन दिया, जिसे गृह विभाग ने जुलाई 2025 में यह कहते हुए निरस्त कर दिया कि जेल नियमावली में पुनर्विचार का कोई प्रावधान नहीं है।

अदालत ने अधिवक्ता की दलील नहीं मानी

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि राज्यपाल की क्षमादान शक्ति दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 433-ए के बंधन से अलग है और दोषी लंबे समय से जेल में है। साथ ही परिवार की आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों को भी आधार बनाया गया।

लेकिन हाई कोर्ट ने कहा कि संबंधित विभाग ने केवल सजा की अवधि को आधार नहीं बनाया था, बल्कि अपराध की गंभीरता और उसके स्वरूप को भी ध्यान में रखकर निर्णय लिया गया था।

सजा माफी कानूनी अधिकार नहीं

खंडपीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि किसी भी दोषी को सजा माफी या समय पूर्व रिहाई का स्वतः प्राप्त कानूनी अधिकार नहीं होता। अदालत ने कहा कि दोषी की पत्नी का आवेदन नई दया याचिका नहीं, बल्कि पहले से खारिज याचिका पर पुनर्विचार का अनुरोध था, जिसकी अनुमति जेल नियमों में नहीं है।

भविष्य में नई याचिका दाखिल करने की छूट

हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस फैसले से दोषी के सभी कानूनी विकल्प समाप्त नहीं होते। यदि भविष्य में कानून के अनुसार वह नई दया याचिका या समय पूर्व रिहाई के लिए आवेदन करता है, तो सक्षम प्राधिकारी उस पर स्वतंत्र रूप से विचार कर सकता है।

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