छत्तीसगढ़ : हाईकोर्ट ने रिश्वतखोरी से जुड़े एक पुराने मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए हेड कांस्टेबल जितेंद्र साहू को दोषमुक्त कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि अभियोजन पक्ष रिश्वत की मांग को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा। इसी आधार पर वर्ष 2012 में विशेष न्यायालय द्वारा सुनाई गई सजा को रद्द कर दिया गया। यह फैसला Chhattisgarh High Court की एकलपीठ में न्यायमूर्ति Rajni Dubey ने सुनाया।

यह मामला वर्ष 2005 का है। शिकायतकर्ता माधव मंडल फरसगांव स्थित कीर्ति ऑटोमोबाइल दुकान का संचालक था। आरोप था कि एक ग्राहक से विवाद के बाद अत्याचार अधिनियम के तहत केस दर्ज कराने की धमकी देकर तत्कालीन हेड कांस्टेबल जितेंद्र साहू ने 1000 रुपये रिश्वत की मांग की। शिकायत पर एंटी करप्शन ब्यूरो जगदलपुर ने ट्रैप कार्रवाई की और आरोपी को रंगे हाथ पकड़ने का दावा किया गया। इसके बाद विशेष न्यायालय ने 2012 में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 और 13 के तहत दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी।

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड और गवाहों के बयानों की विस्तृत जांच में कई गंभीर खामियां पाईं। शिकायतकर्ता की ट्रायल के दौरान मृत्यु हो गई थी, जिससे वह कोर्ट में बयान नहीं दे सका। रिश्वत की रकम आरोपी के पास से नहीं, बल्कि फर्श से बरामद हुई थी। किसी भी गवाह ने रिश्वत की स्पष्ट मांग की पुष्टि नहीं की। ऑडियो रिकॉर्डिंग या वॉयस सैंपल जैसे तकनीकी साक्ष्य भी पेश नहीं किए गए। इसके अलावा गवाहों के बयानों में विरोधाभास पाए गए।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि भ्रष्टाचार के मामलों में रिश्वत की मांग साबित होना अनिवार्य है और केवल रकम की बरामदगी पर्याप्त नहीं है। इन तथ्यों के आधार पर ट्रायल कोर्ट का निर्णय रद्द कर दिया गया और हेड कांस्टेबल जितेंद्र साहू को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।

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