
बलरामपुर शिक्षा विभाग में दिसंबर 2025 में करोड़ों का आहरण,अगस्त 2026 में स्कूलों तक आधी-अधूरी सामग्री की सप्लाई।
शिकायत के बाद तेज हुई सप्लाई, सीएससी से प्रमाण पत्र जुटाने की कवायद जांच से पहले रिकॉर्ड दुरुस्त करने की कोशिश तो नहीं?
बलरामपुर/ राकेश कनौजिया: जिला शिक्षा विभाग में करीब 4.5 करोड़ रुपये की कथित अनियमितता की शिकायत के बाद अब एक और गंभीर मामला सामने आया है। आरोप है कि दिसंबर 2025 में राशि का आहरण होने के बावजूद कई विद्यालयों में फर्नीचर, स्टेशनरी और स्वच्छता सामग्री अगस्त 2026 तक पूरी तरह नहीं पहुंची। शिकायत और जांच शुरू होने के बाद सामग्री की सप्लाई अचानक तेज होने से विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं।

आठ महीने तक कहां थी सामग्री?
यदि दिसंबर 2025 में राशि का आहरण और खरीदी प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी, तो सवाल सीधा है सामग्री विद्यालयों तक पहुंचने में करीब आठ महीने क्यों लग गए?कई विद्यालयों में अब जाकर सामग्री पहुंचने की बात सामने आ रही है। कहीं सामग्री अधूरी बताई जा रही है तो कहीं उसकी गुणवत्ता और मांग के अनुरूप आपूर्ति नहीं होने की शिकायत सामने आने की चर्चा है।

बैक डेट की रिसीविंग का दबाव?
सबसे गंभीर आरोप बैक डेट में सामग्री प्राप्त होने की रिसीविंग देने के दबाव को लेकर है। यदि संस्था प्रमुखों पर वास्तविक सप्लाई से अलग तारीख की रिसीविंग देने का दबाव बनाया गया है, तो यह जांच का अहम बिंदु बन सकता है।ऐसे में जांच टीम को केवल कागजों पर मौजूद प्रमाण पत्रों पर निर्भर रहने के बजाय रिसीविंग की तारीख, स्टॉक रजिस्टर और विद्यालय में मौजूद वास्तविक सामग्री का भौतिक सत्यापन करना होगा।
जांच शुरू होते ही प्रमाण पत्र क्यों?
जांच की प्रक्रिया शुरू होने के बाद सीएससी और संस्था प्रमुखों से सामग्री उपलब्धता प्रमाण पत्र जुटाने की कवायद भी सवालों के घेरे में है।सवाल यह नहीं कि प्रमाण पत्र क्यों लिए जा रहे हैं, बल्कि सवाल यह है कि क्या ये प्रमाण पत्र सामान्य विभागीय प्रक्रिया का हिस्सा हैं या जांच से पहले रिकॉर्ड को अपने पक्ष में मजबूत करने की कोशिश?
इसका जवाब दस्तावेजों और जांच से ही सामने आएगा।
कई सीएससी द्वारा कथित रूप से लिखित जानकारी दिए जाने की बात सामने आ रही है कि मांग के अनुरूप सामग्री नहीं मिली और कुछ सामग्री की गुणवत्ता भी निम्न स्तर की है।अगर ये शिकायतें लिखित रूप में मौजूद हैं तो जांच में इनके सत्यापन के साथ-साथ संबंधित सप्लायर, बिल, चालान और भुगतान प्रक्रिया की भी जांच जरूरी होगी।
दिसंबर का भुगतान, अगस्त की सप्लाई—तारीखों का खेल तो नहीं?पूरे मामले की असली तस्वीर तारीखों के मिलान से सामने आ सकती है।आहरण की तारीख → खरीदी की तारीख → बिल/चालान → सप्लाई की तारीख → विद्यालय की रिसीविंग → स्टॉक रजिस्टर → वास्तविक भौतिक उपलब्धता।इन सभी दस्तावेजों का मिलान होने पर ही पता चलेगा कि करोड़ों रुपये की राशि के बदले सामग्री वास्तव में कब खरीदी गई और कब विद्यालयों तक पहुंची।
रविवार को भी विभागीय सक्रियता पर सवाल
सामग्री वितरण से संबंधित आदेश-निर्देश रविवार को भी जारी किए जाने की चर्चा है। यदि ऐसा हुआ है तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि ऐसी कौन-सी जल्दबाजी थी कि अवकाश के दिन भी प्रक्रिया को गति देनी पड़ी?
सबसे बड़ा सवाल—शिकायत नहीं होती तो सामग्री कब पहुंचती?
पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है—अगर शिकायत नहीं होती, जांच नहीं बैठती और विभागीय अनियमितताओं पर सवाल नहीं उठते, तो क्या अगस्त 2026 में भी यह सामग्री विद्यालयों तक पहुंचती?
इस सवाल का जवाब विभागीय रिकॉर्ड और जांच रिपोर्ट से ही मिल सकेगा।
अब मनीराम यादव की भूमिका भी जांच के दायरे में
पूरे घटनाक्रम में प्रभारी डीईओ मनीराम यादव की भूमिका और विभागीय स्तर पर लिए गए निर्णय भी जांच का विषय हैं। आरोपों की अंतिम पुष्टि अभी जांच के बाद ही होगी,लेकिन शिकायत के बाद सामग्री वितरण में आई तेजी ने कई नए सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।
जांच केवल फाइलों और प्रमाण पत्रों तक सीमित रही तो कई सवाल अनुत्तरित रह सकते हैं। जरूरत है कि जांच टीम विद्यालयवार मौके पर जाकर सामग्री का सत्यापन करे, स्टॉक रजिस्टर देखे, संस्था प्रमुखों के बयान दर्ज करे, सीएससी की शिकायतों की जांच करे और आहरण से लेकर सप्लाई तक प्रत्येक तारीख का मिलान करे।क्योंकि अब सवाल सिर्फ 4.5 करोड़ रुपये के कथित अनियमितता के आरोप का नहीं है—सवाल यह भी है कि करोड़ों की राशि के बदले खरीदी गई सामग्री वास्तव में जमीन पर कितनी है और कब पहुंची?
अब जांच रिपोर्ट खोलेगी पूरी परत
दिसंबर 2025 से अगस्त 2026 तक की पूरी प्रक्रिया अगर निष्पक्ष तरीके से जांची जाती है तो आहरण, खरीदी, भुगतान, सप्लाई, गुणवत्ता और वितरण की पूरी तस्वीर सामने आ सकती है।अब देखना यह है कि जांच से भ्रष्टाचार के आरोपों की परतें खुलती हैं या दस्तावेजों के सहारे मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है।




















