चंडीगढ़। हरियाणा में विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन प्रदेश की राजनीतिक सरगर्मी धीरे-धीरे बढ़ने लगी है। पंजाब से सीमा साझा करने वाले इस राज्य में जातिगत समीकरण हमेशा से चुनावी राजनीति का अहम हिस्सा रहे हैं। इसी बीच करनाल में हाल ही में गूंजे “जय भीम, जय वाल्मीकि, जय श्री राम” के नारों ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ये नारे केवल एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं हैं, बल्कि प्रदेश में बदलते सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों की ओर संकेत कर रहे हैं। खासकर दलित समाज के भीतर बन रही नई वैचारिक पहचान और विभिन्न समूहों को जोड़ने की कोशिशों को इससे जोड़ा जा रहा है। की हरियाणा की राजनीति में लंबे समय से जाट समुदाय का प्रभाव रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में गैर-जाट और दलित मतदाताओं को साधने की कोशिशें तेज हुई हैं। भारतीय जनता पार्टी ने भी इसी रणनीति के तहत गैर-जाट वर्गों और गैर-जाटव दलित समुदायों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने का प्रयास किया है।प्रवासी नेटवर्क जुड़ें दलित राजनीति में बदलाव के संकेत हरियाणा में दलित समुदाय एक बड़ा मतदाता वर्ग है। राज्य की कुल आबादी में अनुसूचित जाति समुदाय की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है। हालांकि दलित समाज एकरूप नहीं है और इसके भीतर कई जातीय समूह शामिल हैं, जिनकी राजनीतिक प्राथमिकताएं अलग-अलग रही हैं। की शराब जब्त परंपरागत रूप से जाटव समुदाय को दलित राजनीति में प्रभावशाली माना जाता रहा है, लेकिन अब अन्य दलित समूहों के बीच भी राजनीतिक भागीदारी और प्रतिनिधित्व को लेकर सक्रियता बढ़ी है। वाल्मीकि, धानक और अन्य दलित समुदाय अपनी अलग पहचान और राजनीतिक हिस्सेदारी को लेकर मुखर हो रहे हैं। करनाल में लगे नारों को इसी बदलते सामाजिक समीकरण से जोड़कर देखा जा रहा है। “जय भीम” दलित चेतना और सामाजिक न्याय की राजनीति का प्रतीक रहा है, जबकि “जय वाल्मीकि” वाल्मीकि समुदाय की पहचान को दर्शाता है। वहीं “जय श्री राम” का नारा हिंदुत्व की राजनीति से जुड़ा हुआ है। इन तीनों नारों का एक साथ इस्तेमाल राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है। भाजपा की सामाजिक रणनीति भारतीय जनता पार्टी पिछले कुछ वर्षों से हरियाणा में गैर-जाट राजनीति को मजबूत करने की रणनीति पर काम करती रही है। पार्टी ने गैर-जाट समुदायों के साथ-साथ दलित समाज के उन वर्गों तक पहुंच बनाने की कोशिश की है, जो परंपरागत रूप से किसी एक राजनीतिक दल के साथ पूरी तरह नहीं जुड़े रहे हैं।प्रवासी नेटवर्क जुड़ें राजनीतिक जानकारों का कहना है कि भाजपा की कोशिश है कि अलग-अलग सामाजिक समूहों को एक व्यापक सामाजिक गठबंधन में जोड़ा जाए। इसमें गैर-जाट पिछड़े वर्ग, दलित समुदाय और अन्य वंचित समूहों को साथ लाने की रणनीति शामिल है।समीकरण कितना प्रभावी होगा, यह चुनावी नतीजों के बाद ही स्पष्ट होगा। क्योंकि हरियाणा में जातीय मुद्दों के साथ-साथ बेरोजगारी, किसान, विकास और स्थानीय समस्याएं भी चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। विपक्ष भी तलाश रहा नए समीकरण दूसरी ओर विपक्षी दल भी दलित और पिछड़े वर्गों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में हैं। कांग्रेस सहित अन्य दल सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए अपनी रणनीति तैयार कर रहे हैं। हरियाणा की राजनीति में किसी भी दल के लिए दलित वोट बैंक को नजरअंदाज करना आसान नहीं है। यही कारण है कि सभी राजनीतिक दल अलग-अलग समुदायों के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने में जुटे हैं। चुनाव से पहले बढ़ेगी राजनीतिक गतिविधियां हालांकि विधानसभा चुनाव में अभी समय है, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं। आने वाले समय में सामाजिक सम्मेलनों, जनसंपर्क अभियानों और राजनीतिक कार्यक्रमों के जरिए अलग-अलग वर्गों तक पहुंच बनाने की कोशिश तेज हो सकती है। करनाल में गूंजे नारों ने यह संकेत जरूर दिया है कि हरियाणा की राजनीति में जातीय और सामाजिक समीकरण फिर से केंद्र में आ रहे हैं। दलित समाज के भीतर बदलती सोच और राजनीतिक भागीदारी की बढ़ती इच्छा आने वाले चुनावों में अहम भूमिका निभा सकती है। हरियाणा की चुनावी राजनीति में अब केवल पारंपरिक जातीय समीकरण ही नहीं, बल्कि नए सामाजिक गठबंधन भी निर्णायक साबित हो सकते हैं। भाजपा का गैर-जाट और गैर-जाटव दलितों को जोड़ने का प्रयास इसी बदलते राजनीतिक परिदृश्य का हिस्सा माना जा रहा है।

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