मुख्यमंत्री के पीएसओ के निजी कार्यक्रम में शामिल हुए मुख्यमंत्री, 10 दिनों से सक्रिय प्रशासनिक अमला, करोड़ों के खर्च और बदहाल सड़कों से जनता त्रस्त

बलरामपुर/राजपुर। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय 26 अगस्त को राजपुर विकासखंड के ग्राम कर्रा में आयोजित "श्री महारुद्र यज्ञ एवं शिव महापुराण कथा" कार्यक्रम में शामिल हुए। स्थानीय स्तर पर यह कार्यक्रम मुख्यमंत्री के पीएसओ (पर्सनल सिक्योरिटी ऑफिसर) से जुड़ा निजी आयोजन बताया जा रहा है। मुख्यमंत्री के आगमन को लेकर प्रशासनिक अमला पिछले 10 दिनों से अधिक समय से लगातार सक्रिय रहा। कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक सहित विभिन्न विभागों के अधिकारियों ने कई बार कार्यक्रम स्थल का दौरा किया और तैयारियों का जायजा लिया।

निजी कार्यक्रम बना प्रशासनिक प्राथमिकता?

मुख्यमंत्री सचिवालय द्वारा जारी कार्यक्रम के अनुसार मुख्यमंत्री हेलीकॉप्टर से कर्रा पहुंचे और धार्मिक कार्यक्रम में शामिल हुए। सुरक्षा, प्रोटोकॉल, यातायात व्यवस्था, हेलीपैड निर्माण, मार्ग निरीक्षण तथा अन्य व्यवस्थाओं के लिए प्रशासनिक मशीनरी पूरी तरह सक्रिय रही। हालांकि सुरक्षा और प्रोटोकॉल संबंधी व्यवस्थाएं प्रशासन की अनिवार्य जिम्मेदारी है, लेकिन क्षेत्र में यह चर्चा भी तेज है कि निजी कार्यक्रम के लिए बड़े पैमाने पर संसाधनों का उपयोग किया गया। यह सवाल लगातार उठ रहा है कि यदि कार्यक्रम निजी प्रकृति का था तो प्रशासनिक संसाधनों की इतनी व्यापक तैनाती किस आधार पर की गई।

पत्रकारों को नहीं मिला औपचारिक निमंत्रण

मुख्यमंत्री के आगमन जैसे बड़े कार्यक्रम के बावजूद जिले के पत्रकारों को न तो भाजपा संगठन की ओर से, प्रशासन प्रशासन की ओर से और न ही आयोजन समिति की ओर से औपचारिक निमंत्रण दिए जाने की बात सामने आई है। क्षेत्र के पत्रकारों के बीच यह विषय चर्चा का केंद्र बना रहा कि जब कार्यक्रम में मुख्यमंत्री स्वयं शामिल हो रहे थे, तब स्थानीय मीडिया को जानकारी और आमंत्रण से दूर क्यों रखा गया।

करोड़ों के खर्च की चर्चा, पारदर्शिता पर उठ रहे सवाल

कार्यक्रम को लेकर क्षेत्र में सबसे अधिक चर्चा कथित करोड़ों रुपये के खर्च को लेकर हो रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि किसी निजी आयोजन के लिए बड़े स्तर पर मंच, पंडाल, पार्किंग, हेलीपैड, सड़क मरम्मत, सुरक्षा व्यवस्थाएं, साफ-सफाई और अन्य तैयारियां की गई हैं, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि इन व्यवस्थाओं का खर्च किसके द्वारा वहन किया गया। हालांकि खर्च की वास्तविक राशि और उसके स्रोत को लेकर अब तक कोई आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है।

जनता के बीच यह भी सवाल उठ रहा है कि जिस जिले में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और आधारभूत सुविधाओं के लिए संसाधनों की कमी की बात कही जाती है, वहां एक निजी कार्यक्रम के लिए इतनी बड़ी व्यवस्थाएं कैसे संभव हो गईं। लोगों का कहना है कि यदि विकास कार्यों के लिए भी इसी स्तर की प्राथमिकता और संसाधन उपलब्ध कराए जाएं तो जिले की कई पुरानी समस्याओं का समाधान हो सकता है।

जनता पूछ रही है क्या विकास कार्यों के लिए भी मिलेगी ऐसी प्राथमिकता?

सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय नागरिकों का मानना है कि यदि किसी आयोजन में सरकारी संसाधनों, कर्मचारियों या सार्वजनिक धन का उपयोग हुआ है तो उसकी पूरी जानकारी सार्वजनिक डोमेन में रखी जानी चाहिए। इससे यह स्पष्ट होगा कि खर्च निजी था, सार्वजनिक था अथवा दोनों का मिश्रित स्वरूप था।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में सार्वजनिक धन के उपयोग पर सवाल उठाना नागरिकों का अधिकार है। ऐसे में यदि करोड़ों रुपये खर्च होने की चर्चाएं चल रही हैं, तो प्रशासन और संबंधित पक्षों को पारदर्शिता के साथ स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। इससे न केवल भ्रम की स्थिति समाप्त होगी बल्कि जनता का विश्वास भी मजबूत होगा।

बदहाल सड़कें और परेशान जनता, लेकिन वर्षों तक नहीं हुई सुनवाई

इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे बड़ा सवाल बलरामपुर जिले की जर्जर सड़कों को लेकर उठ रहा है। अंबिकापुर से राजपुर और राजपुर से रामानुजगंज तक का मार्ग लंबे समय से बदहाल स्थिति में है। बरसात के मौसम में यह समस्या और भी गंभीर हो जाती है। जगह-जगह बने गहरे गड्ढों में वाहन फंसते रहे हैं, लोग घंटों जाम में फंसे रहते हैं और दुर्घटनाओं का खतरा लगातार बना रहता है।

स्थानीय लोगों के अनुसार कई बार सड़क की खराब स्थिति के कारण गंभीर दुर्घटनाएं हुईं, अनेक लोग घायल हुए और कई लोगों ने अपनी जान तक गंवाई। इसके बावजूद सड़क सुधार की मांग वर्षों से अनसुनी रही। जनता लगातार शिकायत करती रही, लेकिन स्थिति में कोई बड़ा सुधार नहीं हुआ।

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