रायपुर/जगदलपुर: छत्तीसगढ़ के विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा महापर्व की शुरुआत पारंपरिक पूजा विधान ‘काछन गादी’ के साथ हो गई है। करीब सात सौ साल पुरानी इस परंपरा में मां काछनदेवी ने कांटों के झूले पर विराजकर बस्तर राजपरिवार, प्रशासन और क्षेत्र की जनता को 75 दिनों तक चलने वाले महापर्व के आयोजन की अनुमति प्रदान की। इस दौरान काछन गुड़ी और गोलबाजार में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज से पूरा क्षेत्र भक्तिमय हो उठा।

परंपरा के अनुसार, इस वर्ष पनका समाज की नाबालिग कुंवारी कन्या पीहू ने मां काछनदेवी का स्वरूप धारण किया। धार्मिक मान्यता है कि पूजा विधान के दौरान कन्या में मां काछनदेवी का वास होता है। अनुष्ठान के तहत देवी स्वरूप कन्या को बेल के नुकीले कांटों से तैयार किए गए झूले पर लिटाया गया। इसके बाद देवी ने बस्तर दशहरा के आगामी कार्यक्रमों को निर्विघ्न और सुरक्षित रूप से संपन्न कराने के लिए अनुमति प्रदान की।

बस्तर राजपरिवार ने लिया मां का आशीर्वाद

पूजा विधान के दौरान बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव ने मां काछनदेवी के समक्ष शीश झुकाकर आशीर्वाद लिया। इसके बाद वे गोलबाजार पहुंचे, जहां मिरगान समुदाय की इष्ट देवी मां रैला देवी की विधिवत पूजा-अर्चना की गई। दोनों पारंपरिक धार्मिक रस्मों के संपन्न होने के साथ ही क्षेत्र में उत्सव का माहौल और उत्साह देखने को मिला। इस दौरान पारंपरिक वाद्ययंत्र मोहरी बाजा की ध्वनि से काछन गुड़ी और गोलबाजार गूंज उठे।

जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की रही मौजूदगी

इस ऐतिहासिक धार्मिक आयोजन में स्थानीय जनप्रतिनिधियों, प्रशासनिक अधिकारियों, श्रद्धालुओं और देश-विदेश से पहुंचे पर्यटकों ने भाग लिया। कार्यक्रम में सांसद एवं बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष महेश कश्यप, समिति के उपाध्यक्ष बलराम मांझी, महापौर संजय पाण्डे, बस्तर कमिश्नर डोमन सिंह, बस्तर रेंज के आईजी बीएन मीणा, कलेक्टर आकाश छिकारा और पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा सहित मांझी-चालकी, नाइक-पाइक, मेंबर-मेंबरिन, पुजारी, गायता तथा बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

आदिवासी संस्कृति और आस्था का प्रतीक है बस्तर दशहरा

बस्तर दशहरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि बस्तर की समृद्ध आदिवासी संस्कृति, सामाजिक एकजुटता और परंपरागत आस्था का प्रतीक है। यह महापर्व बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी को समर्पित है। इसकी विशेषता यह है कि आयोजन में क्षेत्र के विभिन्न समुदायों की सक्रिय भागीदारी रहती है और सदियों से चली आ रही परंपराओं का निर्वहन किया जाता है।

काछन गादी की रस्म पूरी होने के साथ ही बस्तर दशहरा के आगामी अनुष्ठानों का मार्ग प्रशस्त हो गया है। अब अगले 75 दिनों तक बस्तर अंचल में विभिन्न धार्मिक और पारंपरिक कार्यक्रमों के माध्यम से इस ऐतिहासिक महापर्व की रौनक देखने को मिलेगी।

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