

बिलासपुर : छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले से प्रशासनिक कार्यशैली को लेकर एक गंभीर मामला सामने आया है। बिल्हा अनुविभाग में पदस्थ एक पटवारी को रिश्वत मांगने के आरोप में निलंबित किया गया था, लेकिन हैरानी की बात यह है कि महज एक सप्ताह के भीतर ही उसे दोबारा बहाल कर दिया गया। इस फैसले के बाद पूरे मामले पर सवाल खड़े होने लगे हैं।
बोदरी तहसील का मामला: जांच में सामने आए थे आरोप
मामला बोदरी तहसील का है, जहां पटवारी विष्णु प्रसाद निर्मलकर पर राजस्व से जुड़े मामलों के निराकरण के बदले पैसे मांगने की शिकायत मिली थी। इस शिकायत के आधार पर तहसीलदार ने जांच की, जिसमें कई आवेदकों ने भी आरोपों की पुष्टि की। प्रारंभिक जांच में दोषी पाए जाने के बाद 1 अप्रैल 2026 को अनुविभागीय अधिकारी बिल्हा ने छत्तीसगढ़ सिविल सेवा नियम 1966 के तहत उन्हें निलंबित कर दिया था।
निलंबन के दौरान जांच शुरू, मुख्यालय किया गया तय
निलंबन के बाद संबंधित पटवारी का मुख्यालय बिल्हा कार्यालय निर्धारित किया गया और विभागीय जांच की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई थी। इससे यह संकेत मिला था कि प्रशासन इस मामले को गंभीरता से ले रहा है।
8 अप्रैल को पलटा फैसला: नए प्रतिवेदन के आधार पर बहाली
लेकिन घटनाक्रम ने अचानक मोड़ लिया, जब 8 अप्रैल को तहसीलदार की ओर से प्रस्तुत नए प्रतिवेदन के आधार पर एसडीएम ने अपना पूर्व आदेश बदलते हुए पटवारी को फिर से बहाल कर दिया। इतनी जल्दी लिए गए इस फैसले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

जनता में नाराजगी: पारदर्शिता पर उठे सवाल
स्थानीय स्तर पर इस पूरे मामले को लेकर असंतोष देखा जा रहा है। लोगों का कहना है कि जब गंभीर आरोपों के आधार पर निलंबन किया गया था, तो फिर इतनी जल्दी बहाली क्यों की गई, इसका स्पष्ट कारण सामने नहीं आया है। इससे प्रशासन की पारदर्शिता और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्ती पर भी सवाल उठ रहे हैं।
लेनदेन की चर्चाएं तेज: भरोसे पर असर
इस घटनाक्रम के बाद यह भी आशंका जताई जा रही है कि बहाली के पीछे किसी प्रकार का लेनदेन हो सकता है। हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इस तरह की चर्चाओं ने प्रशासन की साख पर असर जरूर डाला है।
जरूरी है स्पष्टता: जवाबदेही से ही बनेगा भरोसा
इस पूरे मामले ने यह साफ कर दिया है कि ऐसे संवेदनशील मामलों में पारदर्शिता और स्पष्ट जवाबदेही बेहद जरूरी है। जब तक प्रशासन ठोस कारण सार्वजनिक नहीं करता, तब तक इस तरह के फैसले सवालों के घेरे में बने रहेंगे।

































