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भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र अब केवल सरकारी संस्थानों तक सीमित नहीं है। निजी कंपनियों और स्टार्टअप की बढ़ती भागीदारी से देश में युवा वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और तकनीकी विशेषज्ञों के लिए रोजगार एवं अनुसंधान के नए अवसर पैदा हो रहे हैं। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने गुरुवार को कहा कि अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलने से प्रतिभा पलायन को कम करने में मदद मिली है और युवा प्रतिभाओं को देश में रहकर अपनी क्षमताओं का इस्तेमाल करने का अवसर मिला है।

निजी क्षेत्र की भागीदारी से बदल रहा अंतरिक्ष इकोसिस्टम

वाराणसी के रुद्राक्ष इंटरनेशनल कोऑपरेशन एंड कन्वेंशन सेंटर में आयोजित नमो बुक फेस्ट में छात्रों से संवाद करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि पहले देश के अंतरिक्ष क्षेत्र में सीमित अवसर होने के कारण कई युवा पेशेवर विदेश में संभावनाएं तलाशते थे। अब निजी कंपनियों और स्टार्टअप के विस्तार से वे भारत में रहकर अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के विकास में योगदान दे सकते हैं। उन्होंने स्काईरूट जैसी निजी अंतरिक्ष कंपनियों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन उद्यमों के उभार से युवा इंजीनियरों के लिए रोजगार, अनुसंधान और नवाचार के नए रास्ते खुले हैं।

‘साइलो का युग समाप्त हो गया है’

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत की वैज्ञानिक शक्ति को मजबूत बनाने के लिए सरकार, उद्योग, स्टार्टअप, शिक्षाविदों और अनुसंधान संस्थानों को मिलकर काम करना होगा। उन्होंने कहा, “साइलो का युग समाप्त हो गया है।” उनके मुताबिक, विभिन्न क्षेत्रों के बीच बेहतर तालमेल से ऐसी वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमताएं विकसित की जा सकती हैं, जो वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकें। नमो बुक फेस्ट का आयोजन 7 और 8 अक्टूबर को किया जा रहा है। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन, नेतृत्व और सेवा के विभिन्न पहलुओं पर आधारित पुस्तकों के माध्यम से उनके शासन प्रमुख के रूप में 25 वर्षों के सफर को प्रस्तुत किया जा रहा है। महोत्सव का समन्वय वरिष्ठ पत्रकार अशोक श्रीवास्तव ने किया। कार्यक्रम में परिचयात्मक संबोधन के बाद छात्रों के साथ करीब एक घंटे तक संवाद और पैनल चर्चा भी हुई।

9 अरब डॉलर की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था 45-46 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद

जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का आकार करीब 9 अरब अमेरिकी डॉलर हो चुका है। मौजूदा विकास गति जारी रहने पर अगले 8-10 वर्षों में यह बढ़कर 45-46 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच सकती है। उन्होंने कहा कि अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी भागीदारी के लिए खोलने से इस इकोसिस्टम का विस्तार हुआ है। अब सरकारी संस्थानों के साथ निजी कंपनियां और स्टार्टअप भी भारत की अंतरिक्ष यात्रा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

आपदा प्रबंधन से बुनियादी ढांचे की योजना तक उपयोगी है अंतरिक्ष तकनीक

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का उपयोग अब केवल रॉकेट और उपग्रह प्रक्षेपण तक सीमित नहीं है। इसका इस्तेमाल बुनियादी ढांचे की योजना बनाने, विकास परियोजनाओं की निगरानी करने और आपदा प्रबंधन में भी किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि भारतीय उपग्रहों से प्राप्त जानकारी नेपाल, बांग्लादेश, म्यांमार और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों को बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाओं की तैयारी करने में भी मदद करती है। इस तरह अंतरिक्ष तकनीक आम लोगों के जीवन को आसान बनाने और आपदाओं से निपटने की क्षमता बढ़ाने में योगदान दे रही है।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी को मिली नीतिगत प्राथमिकता

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि पिछले 12-13 वर्ष भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विस्तार के लिहाज से महत्वपूर्ण रहे हैं। उनके अनुसार, देश में वैज्ञानिक प्रतिभा और मानव संसाधन लंबे समय से मौजूद थे, लेकिन इस क्षमता को राष्ट्रीय विकास में बदलने के लिए अनुकूल नीतिगत वातावरण को हाल के वर्षों में मजबूती मिली है। उन्होंने डीप ओशन मिशन, क्वांटम मिशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सुरक्षा और अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन जैसी पहलों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन क्षेत्रों में क्षमता निर्माण से भारत के वैज्ञानिक और तकनीकी विकास को गति मिल सकती है।

जैव प्रौद्योगिकी और जीनोम इंडिया पहल का उल्लेख

जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियों का जिक्र करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार के लिए जैव प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने पर केंद्रित नीतिगत प्रयासों का उल्लेख किया। उन्होंने कोविड-19 के खिलाफ दुनिया के पहले डीएनए टीके के विकास और जीनोम इंडिया पहल को देश की स्वदेशी वैज्ञानिक क्षमताओं के उदाहरण के रूप में पेश किया। उन्होंने कहा कि ऐसी पहलें सटीक चिकित्सा के क्षेत्र में भारत की तैयारी को मजबूत करने में भी मदद कर सकती हैं।

चंद्रयान-3 ने दिखाई कम लागत में जटिल मिशन की क्षमता

जितेंद्र सिंह ने कहा कि चंद्रयान-3 ने भारत की कम लागत में जटिल अंतरिक्ष मिशन संचालित करने की क्षमता को प्रदर्शित किया है। उन्होंने कहा कि भारत अब केवल दूसरे देशों के वैज्ञानिक विकास का अनुसरण करने तक सीमित नहीं है, बल्कि कई क्षेत्रों में अपनी क्षमताओं के आधार पर वैश्विक स्तर पर आगे बढ़ रहा है।

2047 तक 100 गीगावॉट परमाणु ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य

मंत्री ने परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी भागीदारी बढ़ाने और वर्ष 2047 तक भारत की परमाणु ऊर्जा क्षमता 100 गीगावॉट तक पहुंचाने के लक्ष्य का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा सेंटर जैसी भविष्य की जरूरतों को पूरा करने में परमाणु ऊर्जा महत्वपूर्ण स्वच्छ ऊर्जा स्रोत बन सकती है। उन्होंने अनुसंधान एवं विकास पर बढ़ते खर्च का हवाला देते हुए कहा कि सकल घरेलू अनुसंधान एवं विकास व्यय (जीईआरडी) वर्ष 2013-14 में करीब 46,000-47,000 करोड़ रुपए से बढ़कर लगभग 2-2.5 लाख करोड़ रुपए हो गया है।

एआई के इस्तेमाल के साथ स्वतंत्र सोच बनाए रखने की सलाह

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़े सवालों पर डॉ. जितेंद्र सिंह ने छात्रों को तकनीक अपनाने के साथ अपनी जिज्ञासा और स्वतंत्र सोच बनाए रखने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा, “आपको आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग करने के लिए पर्याप्त बुद्धिमान होना चाहिए।” उन्होंने जोर दिया कि तकनीक का उद्देश्य मानवीय क्षमताओं को मजबूत करना और वैज्ञानिक खोज को बढ़ावा देना होना चाहिए। इसके इस्तेमाल से नई चीजों को जानने की जिज्ञासा और स्वतंत्र रूप से सोचने की क्षमता कमजोर नहीं पड़नी चाहिए।

वैज्ञानिक उपलब्धियों से बढ़ा भारत का आत्मविश्वास

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत की वैज्ञानिक प्रगति से देश में नया आत्मविश्वास पैदा हुआ है और युवाओं के लिए अवसरों का विस्तार हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संदेश ‘हम यह कर सकते हैं’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारत अब वैश्विक वैज्ञानिक विकास के साथ आगे बढ़ रहा है और कई क्षेत्रों में अपनी क्षमताओं को मजबूत कर रहा है। उन्होंने कहा कि विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ने के लिए वैज्ञानिक संस्थानों के बीच सहयोग, युवा प्रतिभाओं के लिए नए अवसर और अनुसंधान को नवाचार, रोजगार तथा रोजमर्रा की समस्याओं के समाधान में बदलना जरूरी है।

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