

मध्य प्रदेश: हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान ऐसा फैसला दिया है, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानूनी विवाह की सीमाओं को स्पष्ट करता है। कोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए एक बालिग युवती को अपनी मर्जी से चुने गए व्यक्ति के साथ रहने की अनुमति प्रदान की है।
हाईकोर्ट ने साफ किया कानून का दायरा
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल किसी युवक के साथ रहना अपने आप में वैध विवाह नहीं माना जा सकता। विवाह की वैधता से जुड़ा अंतिम निर्णय केवल सक्षम न्यायालय द्वारा ही तय किया जाएगा। इस टिप्पणी को कानूनी दृष्टि से बेहद अहम माना जा रहा है।
याचिका में क्या था आरोप
यह मामला अभिषेक गुर्जर द्वारा दायर याचिका से जुड़ा था, जिसकी सुनवाई न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया और न्यायमूर्ति दीपक खोत की खंडपीठ ने की। याचिका में आरोप लगाया गया था कि युवती के पिता ने उसे उसकी इच्छा के खिलाफ अपने पास रोक रखा है।
अदालत ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता को दी प्राथमिकता
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने बालिग युवती के अधिकारों को प्राथमिकता देते हुए कहा कि वयस्क होने के बाद व्यक्ति को यह अधिकार है कि वह अपनी इच्छा से जीवन साथी चुन सके और उसके साथ रह सके।
विवाह को लेकर कानूनी स्थिति भी स्पष्ट
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि साथ रहना और विवाह करना दो अलग कानूनी स्थितियां हैं। किसी भी संबंध को वैवाहिक मान्यता तभी मिलेगी जब वह कानून के तहत मान्य प्रक्रिया से पूरा किया गया हो।
फैसले का संदेश
यह निर्णय न केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को मजबूत करता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि रिश्तों की कानूनी वैधता तय करने का अधिकार केवल सक्षम अदालतों के पास है।





















