छत्तीसगढ़ : हाई कोर्ट ने डॉक्टरों की कानूनी जिम्मेदारी को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि केवल किसी नाबालिग की सोनोग्राफी करने भर से यह नहीं माना जा सकता कि संबंधित डॉक्टर को यौन अपराध की जानकारी थी।अदालत ने कहा कि जब तक यह साबित न हो जाए कि डॉक्टर को पहले से अपराध की जानकारी थी और इसके बावजूद उन्होंने इसकी सूचना नहीं दी, तब तक उनके खिलाफ पॉक्सो एक्ट की धारा 21 के तहत कार्रवाई नहीं की जा सकती।

डॉ. आरती उइके को बड़ी राहत

हाई कोर्ट ने राजनांदगांव की रेडियोलॉजिस्ट डॉ. आरती उइके के खिलाफ दायर पूरक आरोपपत्र और डोंगरगढ़ की विशेष अदालत द्वारा 11 मार्च 2026 को पारित संज्ञान आदेश को निरस्त कर दिया।यह फैसला मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने सुनाया।

नाबालिग गर्भवती होने के मामले से जुड़ा था विवाद

मामला राजनांदगांव जिले के बोरतलाव थाना क्षेत्र का है, जहां 15 वर्षीय किशोरी के करीब आठ महीने की गर्भवती होने का मामला सामने आया था।इस मामले में पुलिस ने मुख्य आरोपी के खिलाफ पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज किया था। जांच के दौरान किशोरी की सोनोग्राफी करने वाली रेडियोलॉजिस्ट डॉ. आरती उइके को भी आरोपी बना लिया गया था।

याचिका में डॉक्टर ने रखा अपना पक्ष

डॉ. आरती उइके ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि उन्होंने पीसी-पीएनडीटी अधिनियम के सभी वैधानिक प्रावधानों का पालन किया है।उन्होंने यह भी कहा कि जांच रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य मौजूद नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि उन्हें किसी यौन अपराध की जानकारी थी या उन्होंने जानबूझकर इसकी सूचना छिपाई।

कोर्ट ने साक्ष्यों के आधार पर दिया फैसला

याचिका पर सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने उपलब्ध रिकॉर्ड और तथ्यों का परीक्षण किया। अदालत ने माना कि केवल सोनोग्राफी करने के आधार पर किसी डॉक्टर को पॉक्सो एक्ट की धारा 21 के तहत आरोपी नहीं ठहराया जा सकता।कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी कार्रवाई के लिए यह साबित होना आवश्यक है कि डॉक्टर को अपराध की जानकारी थी और उन्होंने कानून के तहत अपनी जिम्मेदारी का पालन नहीं किया।इस फैसले को डॉक्टरों की कानूनी जवाबदेही और पॉक्सो एक्ट के प्रावधानों की व्याख्या के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

Leave a reply

Please enter your name here
Please enter your comment!