बिलासपुर :  हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया कि रेरा यानी रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी को कोर्ट की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। यह एक विशेष नियामक संस्था है, जिसका उद्देश्य रियल एस्टेट क्षेत्र को नियंत्रित करना और खरीदारों के हितों की रक्षा करना है।

शिकायत दर्ज करने पर नहीं है समय की बाधा
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि रेरा में शिकायत करने के लिए कोई तय समय सीमा नहीं है। यानी यदि किसी खरीदार को देरी से भी समस्या का सामना करना पड़ता है, तो उसकी शिकायत सिर्फ इस आधार पर खारिज नहीं की जा सकती।

फ्लैट विवाद से शुरू हुआ पूरा मामला
यह मामला जगदलपुर की निवासी निधि साव से जुड़ा है, जिन्होंने रायपुर के पास अमलेश्वर स्थित एक प्रोजेक्ट में फ्लैट बुक किया था। उन्होंने बिल्डर पर समय पर कब्जा नहीं देने और खराब निर्माण का आरोप लगाया।

प्रशासन ने नहीं सुनी, रेरा का लिया सहारा
जब स्थानीय स्तर पर उनकी शिकायतों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, तब उन्होंने रेरा में शिकायत दर्ज कराई। रेरा ने बिल्डर को दो महीने के भीतर निर्माण पूरा कर फ्लैट सौंपने का निर्देश दिया, साथ ही खरीदार को बकाया राशि जमा करने को कहा।

ट्रिब्यूनल ने देरी का हवाला देकर किया खारिज
इस आदेश के खिलाफ अपील की गई, लेकिन रेरा अपीलीय ट्रिब्यूनल ने सुनवाई करने के बजाय यह कहकर मामला खारिज कर दिया कि शिकायत बहुत देर से की गई है।

हाईकोर्ट ने पलटा फैसला, दिए नए निर्देश
हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने ट्रिब्यूनल के इस फैसले को रद्द करते हुए कहा कि मामले की सुनवाई तकनीकी आधार पर नहीं बल्कि तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर होनी चाहिए। कोर्ट ने केस को फिर से ट्रिब्यूनल के पास भेजते हुए नए सिरे से सुनवाई करने के निर्देश दिए।

खरीदारों के लिए क्या है इस फैसले का मतलब
इस फैसले से यह साफ हो गया है कि रेरा के तहत शिकायत करने में देरी कोई बाधा नहीं बनेगी। इससे उन हजारों लोगों को राहत मिलेगी जो लंबे समय से अपने घर से जुड़े विवादों में न्याय की उम्मीद लगाए बैठे हैं।

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