बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पशुधन विकास विभाग के सहायक पशु चिकित्सा क्षेत्र अधिकारियों को बड़ा झटका देते हुए बीवीएससी एंड एएच (बैचलर ऑफ वेटरिनरी साइंस एंड एनिमल हसबेंड्री) पाठ्यक्रम में विभागीय अभ्यर्थी के रूप में प्रवेश देने की मांग वाली चारों याचिकाएं खारिज कर दी हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल पदोन्नति की संभावना के आधार पर किसी कर्मचारी को प्रोफेशनल कोर्स में प्रवेश का कानूनी अधिकार नहीं मिल सकता।

प्रवेश नियमों में विभागीय कर्मचारियों के लिए नहीं है कोई कोटा

जस्टिस बिभू दत्ता गुरु की एकल पीठ ने अपने फैसले में कहा कि शैक्षणिक सत्र 2025-26 में प्रवेश पूरी तरह एडमिशन रूल्स-2025 के तहत हो रहे हैं। इन नियमों में पशुधन विकास विभाग के कार्यरत कर्मचारियों के लिए न तो किसी प्रकार का आरक्षण निर्धारित है और न ही अलग विभागीय कोटा का प्रावधान है। ऐसे में याचिकाकर्ताओं को विभागीय अभ्यर्थी के रूप में प्रवेश देने का कोई वैधानिक आधार नहीं बनता।

पदोन्नति के लिए डिग्री जरूरी होने का दिया गया था तर्क

याचिकाकर्ताओं ने अदालत में दलील दी थी कि बीवीएससी एंड एएच की डिग्री उनके पदोन्नति के लिए आवश्यक है। उन्होंने यह भी कहा कि पूर्व में इसी प्रकार के एक मामले में हाईकोर्ट राहत दे चुका है, इसलिए उन्हें भी समान लाभ मिलना चाहिए।

हालांकि अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि पूर्व का फैसला विशेष परिस्थितियों में दिया गया था और उसे वर्तमान मामले में नजीर के रूप में लागू नहीं किया जा सकता। अब प्रवेश नियम बदल चुके हैं, इसलिए पुराने आदेश का लाभ नहीं दिया जा सकता।

योग्यता होने से प्रवेश का स्वतः अधिकार नहीं मिलता

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि किसी पदोन्नति के लिए आवश्यक शैक्षणिक योग्यता प्राप्त करना अलग विषय है, जबकि किसी प्रोफेशनल पाठ्यक्रम में प्रवेश पाने का अधिकार अलग कानूनी प्रक्रिया से तय होता है। केवल पदोन्नति के लिए डिग्री की आवश्यकता होने से किसी कर्मचारी को स्वतः प्रवेश का अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता।

अनुच्छेद 14 का हवाला देकर नहीं मिल सकता विशेष लाभ

अदालत ने यह भी कहा कि संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता के अधिकार) का सहारा लेकर ऐसा लाभ नहीं मांगा जा सकता, जिसकी अनुमति मौजूदा कानून, प्रवेश नियमों या सरकारी नीति में ही न हो। जब नियमों में विभागीय कर्मचारियों के लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं है, तब अदालत भी ऐसा निर्देश जारी नहीं कर सकती।

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