

नई दिल्ली : अहम सूचना से जुड़ा मामला सामने आया है, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत को दी गई एडवांस सिक्योरिटी लाइजन (ASL) सुरक्षा के खर्च से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है। इस सूचना को सूचना का अधिकार (RTI) के तहत मांगा गया था, लेकिन गृह मंत्रालय ने इसे साझा करने से इनकार कर दिया।
गृह मंत्रालय ने सुरक्षा और गोपनीयता का हवाला देकर रोकी जानकारी
इस मामले में गृह मंत्रालय की ओर से जवाब देते हुए कहा गया कि सुरक्षा से जुड़ी संवेदनशील जानकारी और व्यक्तिगत गोपनीयता के कारण विवरण साझा नहीं किया जा सकता। मंत्रालय ने सूचना के अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(g) और 8(1)(j) का हवाला दिया, जिसके तहत ऐसी सूचनाएं रोकी जा सकती हैं जिनसे सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित हो सकती है या किसी व्यक्ति की निजता का उल्लंघन हो।
2015 से अब तक के खर्च का पूरा ब्यौरा मांगा गया था
आरटीआई आवेदन में वर्ष 2015 से लेकर अब तक की सुरक्षा व्यवस्था पर हुए कुल खर्च का विवरण मांगा गया था। इसमें CISF कर्मियों की तैनाती, पुलिस सुरक्षा, वाहन व्यवस्था, संचार प्रणाली, हथियारों और यात्रा सुरक्षा से जुड़े सभी खर्च शामिल थे।
CISF ने भी स्पष्ट रूप से जानकारी देने से किया इनकार
इस मामले में केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल ने भी सूचना साझा करने से मना कर दिया। बल ने कहा कि वह एक संरक्षित सुरक्षा संगठन है और सूचना अधिकार अधिनियम की धारा 24 के तहत उसे ऐसी जानकारी सार्वजनिक करने से छूट प्राप्त है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि केवल भ्रष्टाचार या मानवाधिकार उल्लंघन जैसे मामलों में ही सीमित जानकारी दी जा सकती है।
गैर-सरकारी पद पर सुरक्षा को लेकर उठे गंभीर सवाल
इस मुद्दे ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है क्योंकि मोहन भागवत किसी संवैधानिक या सरकारी पद पर नहीं हैं, बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे गैर-सरकारी संगठन के प्रमुख हैं। इसके बावजूद उन्हें केंद्र सरकार की ओर से उच्च स्तरीय सुरक्षा प्रदान की जाती है।
जनता के पैसे और पारदर्शिता पर बहस तेज
आलोचकों का कहना है कि चूंकि सुरक्षा व्यवस्था पर खर्च जनता के करों से किया जाता है, इसलिए कम से कम कुल खर्च की जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। उनका तर्क है कि सुरक्षा के संवेदनशील विवरण न भी दिए जाएं, लेकिन वित्तीय पारदर्शिता जरूरी है।
सरकार और सुरक्षा एजेंसियों का रुख कायम
हालांकि गृह मंत्रालय और CISF दोनों ने अपने रुख को स्पष्ट रखते हुए जानकारी देने से इनकार कर दिया है, जिससे यह मामला पारदर्शिता और सुरक्षा के बीच संतुलन को लेकर एक बार फिर चर्चा में आ गया है।





















