
नई दिल्ली। भारत की संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता को लेकर चल रही राजनीतिक बहस के बीच पूर्व न्यायाधीशों और संवैधानिक पदों पर काम कर चुके सेवानिवृत्त अधिकारियों के एक समूह ने खुला पत्र जारी किया है। 7 अक्टूबर 2026 को जारी इस पत्र में राजनीतिक दलों, मीडिया और आम नागरिकों से संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा बनाए रखने की अपील की गई है।
पत्र में खास तौर पर भारत निर्वाचन आयोग, उच्च न्यायपालिका और अन्य वैधानिक संस्थाओं के खिलाफ सार्वजनिक मंचों पर लगाए जा रहे गंभीर आरोपों को लेकर चिंता जाहिर की गई है। हस्ताक्षरकर्ताओं का कहना है कि संस्थाओं की आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन बिना ठोस प्रमाण गंभीर आरोप लगाने से जनता का भरोसा प्रभावित हो सकता है।
कहा- यह किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विरोध में बयान नहीं
पत्र जारी करने वाले पूर्व न्यायाधीशों और अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी राजनीतिक दल का समर्थन या विरोध करना नहीं है। उन्होंने कहा कि संवैधानिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाने के अनुभव के आधार पर उन्होंने मौजूदा परिस्थितियों पर अपनी चिंता सामने रखी है।
उनके मुताबिक लोकतंत्र में संस्थाओं के फैसलों और कार्यप्रणाली पर सवाल उठाना पूरी तरह स्वाभाविक है, लेकिन सार्वजनिक आरोपों को तथ्यों और प्रमाणों पर आधारित रखना जरूरी है।
अधिकारियों के लिए इस्तेमाल की जा रही भाषा पर भी आपत्ति
खुले पत्र में संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारियों के खिलाफ सार्वजनिक बहस में इस्तेमाल की जा रही भाषा का भी मुद्दा उठाया गया। हस्ताक्षरकर्ताओं के अनुसार, कुछ मामलों में अधिकारियों के लिए 'चोर', 'कठपुतली' और 'समझौता करने वाला' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
पत्र में कहा गया कि यदि किसी अधिकारी पर गंभीर आरोप लगाए जाते हैं, तो उनके समर्थन में प्रमाण होना जरूरी है। केवल सार्वजनिक बयानबाजी के आधार पर किसी अधिकारी की विश्वसनीयता पर सवाल उठाना संस्थागत भरोसे के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर विशेष जोर
पूर्व अधिकारियों ने चुनाव आयोग को लोकतांत्रिक व्यवस्था की महत्वपूर्ण संस्था बताते हुए कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव किसी भी लोकतंत्र की बुनियादी शर्त हैं।
पत्र में यह भी कहा गया कि चुनाव आयोग के फैसलों की आलोचना करना या उनकी न्यायिक समीक्षा की मांग करना लोकतांत्रिक अधिकार है। हालांकि, आयोग से जुड़े अधिकारियों पर व्यक्तिगत आरोप लगाने के मामले में सार्वजनिक बहस की भाषा और प्रमाण को लेकर सावधानी बरतनी चाहिए।
यह अपील ऐसे समय सामने आई है, जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर राजनीतिक विवाद जारी है। विपक्षी दलों ने मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं के आरोप लगाए हैं और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग की है। दूसरी ओर, चुनाव आयोग और भाजपा ने चुनावी प्रक्रिया में पक्षपात के आरोपों को खारिज किया है।
राजनीतिक दलों से सार्वजनिक बहस में संयम की अपील
पत्र के जरिए राजनीतिक दलों से आग्रह किया गया कि राजनीतिक मतभेदों को संवैधानिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा से अलग रखा जाए। हस्ताक्षरकर्ताओं ने कहा कि किसी संस्था के फैसले से असहमति लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन व्यक्तिगत हमलों और संस्थागत आलोचना के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।
उनका मानना है कि लगातार लगाए जाने वाले गंभीर आरोप नागरिकों के बीच संवैधानिक संस्थाओं को लेकर अविश्वास पैदा कर सकते हैं।
मीडिया से तथ्य जांचने और जिम्मेदारी निभाने को कहा
पूर्व न्यायाधीशों और अधिकारियों ने मीडिया की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने समाचार माध्यमों से अपील की कि संवैधानिक संस्थाओं से संबंधित आरोपों को रिपोर्ट करते समय तथ्यात्मक सटीकता और जिम्मेदार पत्रकारिता का ध्यान रखा जाए।
उन्होंने नागरिकों से भी सार्वजनिक बहस में तथ्यों को प्राथमिकता देने और संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता के महत्व को समझने का आग्रह किया।
संस्थाओं की आलोचना और जवाबदेही भी जरूरी
हालांकि, संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता की रक्षा की इस अपील के साथ उनकी जवाबदेही का मुद्दा भी महत्वपूर्ण बना हुआ है। पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा समेत कुछ पूर्व अधिकारियों और विशेषज्ञों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठाए हैं।
इनका तर्क है कि जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए संस्थाओं में पारदर्शिता, स्वतंत्र निर्णय प्रक्रिया और उठाए गए सवालों का जवाब देने की व्यवस्था भी जरूरी है।
इससे पहले भी कुछ पूर्व न्यायाधीशों, अधिकारियों और नागरिक संगठनों की ओर से चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली की समीक्षा तथा मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा की मांग उठाई जा चुकी है। ऐसे में मौजूदा बहस केवल संस्थाओं की आलोचना तक सीमित नहीं है, बल्कि उनकी स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच संतुलन का सवाल भी इससे जुड़ा है।
लोकतंत्र में भरोसा और जवाबदेही दोनों पर जोर
7 अक्टूबर को जारी इस खुले पत्र का मूल संदेश संवैधानिक संस्थाओं के प्रति जनता का भरोसा बनाए रखने से जुड़ा है। हस्ताक्षरकर्ताओं ने असहमति और आलोचना के लोकतांत्रिक अधिकार को स्वीकार करते हुए आरोपों के मामले में प्रमाण और जिम्मेदारी को जरूरी बताया है।
वहीं, दूसरी तरफ चुनाव आयोग और अन्य संस्थाओं की पारदर्शिता तथा जवाबदेही को लेकर उठ रहे सवाल बताते हैं कि यह बहस केवल संस्थाओं की प्रतिष्ठा तक सीमित नहीं है। आने वाले समय में चुनाव आयोग, न्यायपालिका और अन्य संवैधानिक निकायों को लेकर होने वाली कानूनी और राजनीतिक चर्चा में स्वतंत्रता, विश्वसनीयता और जवाबदेही तीनों मुद्दे अहम बने रह सकते हैं।




















