
उत्तर प्रदेश : 2027 विधानसभा चुनाव से पहले गोरखपुर की एक राजनीतिक घटना ने नई बहस को जन्म दे दिया है। समाजवादी पार्टी की प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान बैठने की जगह को लेकर शुरू हुआ विवाद मारपीट और थप्पड़ तक पहुंच गया। घटना में पूर्व सपा जिलाध्यक्ष राम नगीना साहनी के साथ कथित तौर पर हाथापाई हुई। इसके बाद पार्टी ने अंशुमान सिंह को निष्कासित कर दिया और गोरखपुर की जिला तथा महानगर इकाइयों को भंग कर दिया।
कुर्सी से शुरू हुआ विवाद कैसे पहुंचा पार्टी हाईकमान तक
गोरखपुर प्रेस क्लब में सपा की प्रेस वार्ता के दौरान बैठने की व्यवस्था को लेकर नेताओं के बीच कहासुनी हुई। मामला बढ़ने पर हाथापाई की स्थिति बन गई। आरोप है कि अंशुमान सिंह के बेटे कमलेश सिंह ने पूर्व जिलाध्यक्ष राम नगीना साहनी को थप्पड़ मारा। घटना का वीडियो भी सामने आया है। हालांकि, दोनों पक्षों की ओर से एक दूसरे पर आरोप लगाए गए हैं।
घटना के बाद मामला स्थानीय विवाद तक सीमित नहीं रहा और इसकी गूंज पार्टी नेतृत्व तक पहुंची। सपा ने अंशुमान सिंह को पार्टी से बाहर कर दिया। इसके बाद गोरखपुर जिला और महानगर संगठन को भी भंग कर दिया गया।
संजय निषाद की एंट्री से बढ़ा राजनीतिक आयाम
मामले में निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद ने राम नगीना साहनी के समर्थन में आवाज उठाई। उन्होंने सपा नेतृत्व से कार्रवाई की मांग की और कार्रवाई नहीं होने पर सपा कार्यालय के घेराव की चेतावनी भी दी।
इसके बाद यह विवाद केवल सपा के स्थानीय संगठन में हुए टकराव तक सीमित नहीं दिख रहा। निषाद समुदाय से जुड़े राजनीतिक सवाल भी चर्चा में आने लगे हैं। वहीं, अंशुमान सिंह के समर्थन में क्षत्रिय समाज की बैठकों और गतिविधियों की खबरों ने भी गोरखपुर के सियासी माहौल को चर्चा में ला दिया है।
गोरखपुर में निषाद वोट क्यों महत्वपूर्ण माने जाते हैं
गोरखपुर और आसपास के पूर्वांचली इलाकों की राजनीति में सामाजिक समीकरणों की भूमिका लंबे समय से महत्वपूर्ण रही है। 2024 के लोकसभा चुनाव में गोरखपुर सीट पर भाजपा के रवि किशन को 5,85,834 वोट मिले थे, जबकि सपा की काजल निषाद को 4,82,308 वोट मिले। रवि किशन ने 1,03,526 वोट के अंतर से चुनाव जीता था।
ऐसे चुनावी आंकड़ों के बीच किसी बड़े सामाजिक समूह से जुड़े मुद्दे स्थानीय राजनीति में चर्चा का विषय बनना स्वाभाविक है। हालांकि, केवल लोकसभा के आंकड़ों के आधार पर आगामी विधानसभा चुनाव के नतीजों का अनुमान लगाना उचित नहीं होगा।
2027 से पहले सपा के लिए सामने आया संगठनात्मक सवाल
गोरखपुर की घटना ऐसे समय सामने आई है जब उत्तर प्रदेश में अगले विधानसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर राजनीतिक गतिविधियां बढ़ रही हैं। सपा के लिए यह प्रकरण इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विवाद पार्टी के ही कार्यक्रम के दौरान हुआ और इसके बाद संगठनात्मक स्तर पर बड़ी कार्रवाई करनी पड़ी।
फिलहाल इस घटनाक्रम के तीन पहलू चर्चा में हैं। पहला, सपा के स्थानीय संगठन में सामने आया विवाद। दूसरा, राम नगीना साहनी के समर्थन में संजय निषाद की सक्रियता। तीसरा, अंशुमान सिंह के समर्थन में क्षत्रिय समाज की गतिविधियां।
इन तीनों घटनाक्रमों का गोरखपुर की स्थानीय राजनीति पर आगे क्या असर पड़ता है, यह आने वाले दिनों में होने वाली राजनीतिक गतिविधियों से ज्यादा स्पष्ट होगा।




















