बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने लोकसेवकों के खिलाफ शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी भी लोकसेवक के विरुद्ध शिकायत दर्ज करने के लिए कानून में निर्धारित सभी औपचारिकताओं का पालन करना अनिवार्य है। यदि शिकायत के साथ निर्धारित प्रारूप में शपथपत्र और 250 रुपये का शुल्क जमा नहीं किया गया है, तो उस आधार पर शुरू की गई कार्रवाई वैध नहीं मानी जाएगी।

हाई कोर्ट ने आयोग के आदेश किए निरस्त

जस्टिस संजय के. अग्रवाल की एकलपीठ ने डॉ. शिव शंकर अग्रवाल की याचिका पर सुनवाई करते हुए छत्तीसगढ़ लोक आयोग द्वारा 17 और 18 नवंबर 2020 को जारी आदेशों को रद्द कर दिया। अदालत ने माना कि आयोग ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्रवाई की थी। इसी आधार पर शिकायतकर्ता वीरेंद्र अग्रवाल की मूल शिकायत भी खारिज कर दी गई।

आय से अधिक संपत्ति के आरोप पर हुई थी शिकायत

मामला रायपुर स्थित पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय में चिकित्सा अधिकारी के पद पर कार्यरत डॉ. शिव शंकर अग्रवाल से जुड़ा है। उनके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने का आरोप लगाते हुए लोक आयोग में शिकायत दर्ज कराई गई थी। इसी शिकायत के आधार पर आयोग ने वर्ष 2017 में जांच प्रक्रिया शुरू की थी।

याचिकाकर्ता ने उठाई प्रक्रिया पर आपत्ति

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सुनील कुमार सोनी ने अदालत में तर्क दिया कि शिकायत के साथ न तो अनिवार्य शपथपत्र लगाया गया था और न ही 250 रुपये का निर्धारित शुल्क जमा किया गया था। इसके बावजूद आयोग ने जांच शुरू कर दी, जो संबंधित कानून के प्रावधानों के विपरीत है।

आयोग का तर्क कोर्ट ने किया खारिज

सुनवाई के दौरान लोक आयोग की ओर से दलील दी गई कि मामला शिकायत का नहीं, बल्कि अधिनियम की धारा 6 के तहत प्राप्त 'विशिष्ट सूचना' का था, इसलिए शिकायत से जुड़ी औपचारिक शर्तें लागू नहीं होतीं। हाई कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

कोर्ट बोला- कानून की प्रक्रिया से नहीं किया जा सकता समझौता

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि उपलब्ध दस्तावेजों और सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि शिकायत के साथ न तो शपथपत्र संलग्न था और न ही निर्धारित शुल्क जमा किया गया था। इसके बावजूद आयोग ने उसी शिकायत के आधार पर कार्रवाई शुरू की।

हाई कोर्ट ने कहा कि जब किसी कानून में शिकायत दर्ज करने और उस पर कार्रवाई की स्पष्ट प्रक्रिया निर्धारित हो, तो उसका अक्षरश: पालन किया जाना चाहिए। बाद में उसी शिकायत को 'सूचना' का स्वरूप देकर कानूनी शर्तों से बचने का प्रयास स्वीकार नहीं किया जा सकता।

पूरी कार्रवाई को बताया विधि विरुद्ध

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना शुरू की गई जांच कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है। इसी आधार पर लोक आयोग की संपूर्ण कार्रवाई को विधि विरुद्ध घोषित करते हुए निरस्त कर दिया गया।

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