INDIA - DECEMBER 19: APJ Abdul Kalam (Photo by Bhawan Singh/The The India Today Group via Getty Images)

भारत के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनकी पहचान उनके पद से नहीं, बल्कि उनके विचारों, कर्मों और सपनों से बनती है। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम एक ऐसा ही नाम हैं, जिन्होंने विज्ञान की प्रयोगशालाओं से लेकर राष्ट्रपति भवन तक का सफर तय किया और अपनी सादगी, दूरदृष्टि तथा राष्ट्रनिर्माण के संकल्प से करोड़ों भारतीयों को प्रेरित किया। वे वैज्ञानिक थे, शिक्षक थे, लेखक थे और सबसे बढ़कर ऐसे स्वप्नद्रष्टा थे, जो भारत को विकसित राष्ट्र के रूप में देखने का सपना केवल स्वयं नहीं देखते थे, बल्कि देश के युवाओं को भी उस सपने का भागीदार बनाते थे।

15 अक्टूबर, 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम में जन्मे अवुल पकिर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम ने सीमित संसाधनों के बीच अपनी शिक्षा और वैज्ञानिक यात्रा की शुरुआत की। मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से वैमानिकी अभियांत्रिकी की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने अपना जीवन भारत की वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमताओं को मजबूत करने के लिए समर्पित कर दिया। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि परिस्थितियां चाहे जैसी हों, दृढ़ इच्छाशक्ति, ज्ञान और निरंतर परिश्रम से असाधारण उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं।

अंतरिक्ष में भारत की उड़ान को दिए नए पंख

डॉ. कलाम के वैज्ञानिक जीवन का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) से जुड़ा है। भारत के पहले स्वदेशी उपग्रह प्रक्षेपण यान एसएलवी-III के परियोजना निदेशक के रूप में उन्होंने देश की अंतरिक्ष यात्रा को नई दिशा दी। जुलाई 1980 में इस प्रक्षेपण यान ने रोहिणी उपग्रह को पृथ्वी की निकटवर्ती कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित किया। यह उपलब्धि भारत की स्वदेशी वैज्ञानिक क्षमता और तकनीकी आत्मनिर्भरता का महत्त्वपूर्ण पड़ाव बनी।

इसरो में अपने लगभग दो दशकों के कार्यकाल के दौरान उन्होंने प्रक्षेपण यान प्रौद्योगिकी के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी) के विकास से जुड़े उनके योगदान ने भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की भावी उपलब्धियों के लिए आधार तैयार करने में मदद की।

मिसाइल मैन: रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का संकल्प

अंतरिक्ष विज्ञान में योगदान के बाद डॉ. कलाम ने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) में स्वदेशी मिसाइल प्रौद्योगिकी के विकास की जिम्मेदारी संभाली। एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम के प्रमुख के रूप में उन्होंने अग्नि और पृथ्वी जैसी मिसाइल प्रणालियों के विकास एवं परिचालन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी योगदान के कारण उन्हें देशभर में ‘मिसाइल मैन ऑफ इंडिया’ के नाम से पहचान मिली।

जुलाई 1992 से दिसंबर 1999 तक रक्षा मंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार और रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव के रूप में उन्होंने रक्षा प्रौद्योगिकी में स्वदेशी क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया। पोखरण-II परमाणु परीक्षणों के दौरान भी उन्होंने परमाणु ऊर्जा विभाग के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। हल्के लड़ाकू विमान सहित विभिन्न रक्षा विकास परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में उनका योगदान भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता के व्यापक लक्ष्य से जुड़ा रहा।

‘विजन 2020’: विकसित भारत का सपना

डॉ. कलाम का विश्वास था कि भारत के पास विकसित राष्ट्र बनने के लिए आवश्यक प्रतिभा, संसाधन और क्षमता मौजूद है। जरूरत थी तो एक स्पष्ट दृष्टिकोण, वैज्ञानिक सोच और सामूहिक प्रयास की।

प्रौद्योगिकी सूचना, पूर्वानुमान एवं मूल्यांकन परिषद (टीआईएफएसी) के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने लगभग 500 विशेषज्ञों के सहयोग से ‘टेक्नोलॉजी विजन 2020’ तैयार करने में नेतृत्व दिया। इस दस्तावेज ने कृषि, ऊर्जा, शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग और प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में विकास के लिए एक व्यापक दिशा प्रस्तुत की।

नवंबर 1999 से नवंबर 2001 तक भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार के रूप में उन्होंने विकास संबंधी नीतियों और रणनीतियों को आगे बढ़ाने में योगदान दिया। उनका लक्ष्य ऐसा भारत बनाना था, जहां वैज्ञानिक प्रगति का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे और विकास के अवसर सभी को उपलब्ध हों।

राष्ट्रपति भवन में सादगी की मिसाल

25 जुलाई, 2002 को डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने भारत के 11वें राष्ट्रपति के रूप में पदभार ग्रहण किया। एक वैज्ञानिक का देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंचना भारतीय लोकतंत्र और ज्ञान की शक्ति का उल्लेखनीय उदाहरण था।

अपने कार्यकाल के दौरान वे आम नागरिकों, विशेषकर विद्यार्थियों और युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय रहे। उनकी पहचान एक ऐसे राष्ट्रपति के रूप में बनी, जो औपचारिकताओं से आगे बढ़कर लोगों से संवाद करना पसंद करते थे। वे विद्यार्थियों से उनके सपनों, सवालों और भविष्य के बारे में चर्चा करते और उन्हें देश के विकास में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित करते थे।

किताबों में दर्ज विचार, पीढ़ियों के लिए प्रेरणा

डॉ. कलाम का व्यक्तित्व विज्ञान और सार्वजनिक जीवन तक सीमित नहीं रहा। लेखन के माध्यम से भी उन्होंने अपने विचारों को देश-दुनिया तक पहुंचाया। ‘विंग्स ऑफ फायर’, ‘इंडिया 2020: ए विजन फॉर द न्यू मिलेनियम’, ‘इग्नाइटेड माइंड्स’ और ‘माई जर्नी’ उनकी चर्चित पुस्तकों में शामिल हैं।

इन पुस्तकों में उनके जीवन के अनुभवों, वैज्ञानिक यात्रा, राष्ट्रनिर्माण की परिकल्पना और युवाओं की क्षमता पर उनके विश्वास की झलक मिलती है। अनेक भारतीय भाषाओं में अनूदित इन पुस्तकों ने विभिन्न पीढ़ियों के पाठकों को बड़े लक्ष्य निर्धारित करने और उन्हें हासिल करने के लिए निरंतर प्रयास करने की प्रेरणा दी।

उनके योगदान के सम्मान में उन्हें वर्ष 1981 में पद्म भूषण, 1990 में पद्म विभूषण और 1997 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया। उन्हें देश-विदेश के अनेक विश्वविद्यालयों और संस्थानों से मानद डॉक्टरेट की उपाधियां भी मिलीं।

एक वैज्ञानिक, एक शिक्षक और एक जीवंत विचार

डॉ. कलाम का जीवन इस बात का प्रमाण है कि किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके नागरिकों के ज्ञान, चरित्र और संकल्प में निहित होती है। उन्होंने अंतरिक्ष विज्ञान और रक्षा प्रौद्योगिकी में भारत की क्षमताओं को मजबूत करने में योगदान दिया, लेकिन उनकी सबसे स्थायी पहचान युवाओं को बड़े सपने देखने और उन्हें साकार करने के लिए प्रेरित करने वाले शिक्षक की रही।

वे जीवनभर विद्यार्थियों के बीच रहे और शिक्षा को राष्ट्रनिर्माण का सबसे प्रभावी माध्यम मानते रहे। उनके विचारों का केंद्र हमेशा एक ऐसा भारत रहा, जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाए, आत्मनिर्भर बने और विकास के साथ मानवीय मूल्यों को भी महत्व दे।

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की विरासत केवल उनकी वैज्ञानिक उपलब्धियों या राष्ट्रपति के रूप में उनके कार्यकाल में नहीं, बल्कि उन असंख्य युवाओं के सपनों में जीवित है, जिन्हें उन्होंने अपने भविष्य और देश की संभावनाओं पर विश्वास करना सिखाया।

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